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परिचय
हृदय
हृदय न तो भौतिक पंपिंग अंग है, न भाव हृदय चक्र। यह शुद्ध चेतना का आध्यात्मिक केंद्र, आत्मन् का आसन, और अहं-वृत्ति का उदय तथा अंतिम विलय स्थान है।
‘हृत्’ (केंद्र) और ‘अयम्’ (यह) से — ‘यह केंद्र है’।
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तीन केंद्रों का भेद
अनाहत चक्र
सुषुम्ना पर सूक्ष्म ऊर्जा भँवर।
वायु, भाव, करुणा और अनाहत नाद का शासन।
हृदय अंग
वक्ष गुहा में स्थूल मांसपेशी अंग।
शारीरिक रक्त परिसंचरण।
हृदय
शुद्ध जागरूकता (आत्मन्) का कारण आसन।
उरोस्थि के दाएँ दो अंगुल — जहाँ ‘मैं’ की अनुभूति इंगित होती है।
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सूर्य, चंद्र एवं अमृत नाड़ी
सूर्य
हृदय सूर्य है — स्वप्रकाशित शुद्ध साक्षी चेतना।
चंद्र
सहस्रार / मस्तिष्क चंद्र है — हृदय के प्रकाश को प्रतिबिंबित कर विचार और इंद्रियाँ प्रकाशित करता है।
अमृत नाड़ी
अमृत नाड़ी हृदय को सहस्रार से जोड़ती है। सहज निर्विकल्प समाधि में प्राण स्थायी रूप से हृदय में उतरता है—चित्त-जड़ ग्रंथि कट जाती है।
अमृत नाड़ी से हृदय का प्रकाश मस्तिष्क तक जाता है। बहिर्मुखी मन जगत् प्रक्षेपित करता है; आत्म विचार प्रतिबिंबित प्रकाश को हृदय में लौटा देता है।
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आत्म विचार में हृदय
मानसिक गतिविधि के पीछे आंतरिक शांत स्थान की जागरूकता।
दाएँ वक्ष की ओर ऊष्मा, प्रकाश या सहज चुंबकीय खिंचाव।
द्रष्टा–दृश्य सीमा विलीन; हृदय वह अनंत आकाश है जिसमें शरीर और जगत् दिखाई देते हैं।
हृदय भौतिक नहीं, आध्यात्मिक है। हृदयम् का अर्थ है ‘यह केंद्र है’। वही स्रोत जहाँ से विचार उठते हैं, जहाँ रहते हैं, और जहाँ विलीन होते हैं।
जिससे देहधारियों के सब विचार निकलते हैं, उसे हृदय कहते हैं। इसकी सभी व्याख्याएँ मात्र मानसिक अवधारणाएँ हैं।