हृदय · अमृत नाड़ी · आत्म विचार

हृदय: अद्वैत और रमण महर्षि के उपदेश में आध्यात्मिक हृदय

शारीरिक अंग या अनाहत नहीं — आत्मन् का आसन और अहं-वृत्ति का स्रोत

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परिचय

हृदय

हृदय न तो भौतिक पंपिंग अंग है, न भाव हृदय चक्र। यह शुद्ध चेतना का आध्यात्मिक केंद्र, आत्मन् का आसन, और अहं-वृत्ति का उदय तथा अंतिम विलय स्थान है।

‘हृत्’ (केंद्र) और ‘अयम्’ (यह) से — ‘यह केंद्र है’।

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तीन केंद्रों का भेद

हृदय

शुद्ध जागरूकता (आत्मन्) का कारण आसन।

उरोस्थि के दाएँ दो अंगुल — जहाँ ‘मैं’ की अनुभूति इंगित होती है।

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सूर्य, चंद्र एवं अमृत नाड़ी

सूर्यहृदय
चंद्रसहस्रार

सूर्य

हृदय सूर्य है — स्वप्रकाशित शुद्ध साक्षी चेतना।

चंद्र

सहस्रार / मस्तिष्क चंद्र है — हृदय के प्रकाश को प्रतिबिंबित कर विचार और इंद्रियाँ प्रकाशित करता है।

अमृत नाड़ी

अमृत नाड़ी हृदय को सहस्रार से जोड़ती है। सहज निर्विकल्प समाधि में प्राण स्थायी रूप से हृदय में उतरता है—चित्त-जड़ ग्रंथि कट जाती है।

अमृत नाड़ी से हृदय का प्रकाश मस्तिष्क तक जाता है। बहिर्मुखी मन जगत् प्रक्षेपित करता है; आत्म विचार प्रतिबिंबित प्रकाश को हृदय में लौटा देता है।

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आत्म विचार में हृदय

मानसिक गतिविधि के पीछे आंतरिक शांत स्थान की जागरूकता।

हृदय भौतिक नहीं, आध्यात्मिक है। हृदयम् का अर्थ है ‘यह केंद्र है’। वही स्रोत जहाँ से विचार उठते हैं, जहाँ रहते हैं, और जहाँ विलीन होते हैं।

Bhagavan Ramana Maharshi

जिससे देहधारियों के सब विचार निकलते हैं, उसे हृदय कहते हैं। इसकी सभी व्याख्याएँ मात्र मानसिक अवधारणाएँ हैं।

Ramana Gita
मन
हृदय
द्वैत, रैखिक काल, स्मृति, तर्क, अहं और द्रष्टा–दृश्य भेद का क्षेत्र।
अद्वैत, कालातीत उपस्थिति, शुद्ध साक्षी जागरूकता, शांति और मोक्ष का क्षेत्र।