एक समय की बात है, महर्षि सांदीपनि के आश्रम में भगवान कृष्ण और सुदामा नाम का एक साधारण बालक गहरे मित्र बनकर साथ पढ़ते थे। दोनों साथ खाते, लकड़ियां काटते और हंसते-खेलते थे। समय बीता, कृष्ण द्वारका के राजा बन गए और सुदामा सादगी भरा गरीब जीवन बिताने लगे। एक दिन सुदामा की पत्नी ने उन्हें अपने मित्र कृष्ण से मिलने भेजा। सुदामा झिझके कि वे राजा के पास खाली हाथ कैसे जाएं? उन्होंने फटे कपड़े में थोड़े से भुने हुए चावल (पोहा) बांध लिए। जब सुदामा द्वारका के महल पहुंचे, तो पहरेदारों ने उनके फटे कपड़ों को देखकर रोका। लेकिन जैसे ही कृष्ण को अपने मित्र का नाम पता चला, वे नंगे पैर ही दौड़ पड़े! उन्होंने सुदामा को गले से लगा लिया और प्यार के आंसू बहाए। कृष्ण ने बड़े चाव से वो साधारण पोहा खाया। जब सुदामा लौटे, तो उन्होंने देखा कि उनकी कुटिया महल बन चुकी थी, लेकिन सबसे अनमोल तोहफा तो कृष्ण का सच्चा और कभी न बदलने वाला प्यार था!