अध्याय 1
इंद्र-पूजा का निषेध एवं गोवर्धन पूजन का प्रस्ताव
नंदबाबा और ब्रजवासियों को इंद्र के यज्ञ की तैयारी करते देखकर बालक कृष्ण ने उनसे प्रश्न किया। कृष्ण ने समझाया कि वर्षा प्रकृति का चक्र है और ब्रजवासियों का वास्तविक पोषण गोवर्धन पर्वत, वन और गौएँ करती हैं। कृष्ण के तर्कों से सहमत होकर ब्रजवासियों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा की और छप्पन भोग का अन्नकूट उत्सव मनाया।
अध्याय 2
इंद्र का कोप एवं श्री कृष्ण द्वारा गोवर्धन धारण
अपनी पूजा बंद होने से क्रोधित होकर इंद्र ने संवर्तक बादलों को ब्रज में प्रलयंकारी वर्षा और तूफान का आदेश दिया। भयभीत ब्रजवासियों और पशुओं की रक्षा के लिए श्री कृष्ण ने विशाल गोवर्धन पर्वत को अपनी बाएँ हाथ की कनिष्ठिका उंगली पर उठा लिया और सात दिनों तक पूरे ब्रज को पर्वत के नीचे शरण दी।
अध्याय 3
इंद्र का अहंकार-भंग एवं श्री गोविंद का राज्याभिषेक
श्री कृष्ण के दिव्य स्वरूप को पहचान कर इंद्र का अहंकार चूर-चूर हो गया। उन्होंने बादलों को रोका और कृष्ण के चरणों में गिरकर क्षमा माँगी। कामधेनु सुरभि गाय ने प्रभु का दूध से अभिषेक किया और इंद्र ने उन्हें 'गोविंद' (गौओं व प्रकृति के रक्षक) के नाम से सुशोभित किया।
पठन संदर्भ
कथा, पाठांतर और अभ्यास
यह सार्वजनिक गाइड एक संक्षिप्त भक्तिपूर्ण पुनर्कथन है। विभिन्न पुराणों, रामायण परंपराओं, क्षेत्रों और संप्रदायों में प्रसंग व विवरण अलग हो सकते हैं।
- पहले कथा पढ़ें, फिर नीचे दिए कथा-पाठ पर विचार करें।
- व्रत या विधिवत पाठ के लिए अपने परिवार या परंपरा के स्वीकृत संस्करण का प्रयोग करें।
- संबद्ध देवता गाइड से प्रतीक और उपासना संदर्भ समझें।