योगसूत्र १.३३
मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्॥
सरल अर्थ
सुखी के प्रति मैत्री, दुखी के प्रति करुणा, पुण्य के प्रति मुदित भाव, और हानिकारक से स्वस्थ दूरी — इससे चित्त प्रसन्न होता है।
कब पढ़ें
जब सबके मूड सोख लो और थक जाओ।