सामवेद

Chapter 1

Purvarchika CHAPTER-1

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The Principle of Vaishvanara Agni-Tattva in Vedic Metaphysics

Purvarchika का यह अध्याय सामगान के माध्यम से चित्त की एकाग्रता और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करता है। अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

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Mantra 1

Devata: Agni · Rishi: Bharadvaja Barhaspatya

अग्न॒ आ या॑हि वी॒तये॑ गृणा॒नो ह॒व्यदा॑तये | नि होता॑ सत्सि ब॒र्हिषि॑ ||

Agna 4 yahi vitaye grnano havyadataye. Ni hota satsi barhisi.

वैदिक अध्यात्म में, अग्नि (ऋषि Bharadvaja Barhaspatya द्वारा दृष्ट) मात्र एक बाह्य देव नहीं, बल्कि अंतःकरण में जाग्रत ज्ञान-चेतना और संकल्प-शक्ति (*क्रतु*) के प्रतीक हैं। इस मंत्र में प्रयुक्त पद यह दर्शाते हैं कि जब साधक अपने मन की वेदी (*बर्हिस*) पर वासनाओं रूपी आहुतियों (*हवि*) को विवेक की अग्नि में समर्पित करता है, तो अज्ञान का नाश होता है। दार्शनिक दृष्टि से, यह ऋचा वेदान्त के आत्म-बोध और निष्काम कर्मयोग का मार्ग प्रशस्त करती है, जहाँ व्यक्ति अपने व्यक्तिगत अहंकार को समष्टि चेतना में विलीन कर परम सत्य का अनुभव करता है।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय तथा यज्ञ विधान ((Rg. 6-16-10)) में अग्नि के आह्वान एवं चित्त शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 2

Devata: Agni · Rishi: Bharadvaja Barhaspatya

त्वम॑ग्ने य॒ज्ञानां॒ होता॒ विश्वे॑षां हि॒तः | दे॒वेभि॒र्मानु॑षे॒ जने॑ ||

Tvam agne yajnanam hota visvesam hitah.

यहाँ अग्नि की स्तुति 'विश्वेषां हितः' (समस्त प्राणियों के कल्याणकारी) के रूप में की गई है। दार्शनिक रूप से, बिना अहंकार के किया गया प्रत्येक लोक-कल्याणकारी कार्य यज्ञ है। अग्नि मानव चेतना में प्रथम ऋत्विज (*होता*) का कार्य करते हैं, जो व्यक्तिगत मानवीय प्रयासों को उच्च दिव्य शक्तियों से जोड़ते हैं।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय ((Rg. 6-16-1)) में लोक-कल्याण एवं प्रकृति-सामंजस्य हेतु प्रयुक्त।

Mantra 3

Devata: Agni · Rishi: Kanva Medhatithi

अ॒ग्निं दू॒तं वृ॑णीमहे॒ होता॑रं वि॒श्ववे॑दसम् | अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतु॑म् ||

अग्नि 'दूतम' (दिव्य संदेशवाहक) के रूप में मर्त्य लोक की अनुभूतियों को अमृत तत्व से जोड़ते हैं। अपनी 'सुकृतु' (पावन विवेक-शक्ति) से अग्नि हमारी भावनाओं को पवित्र करके समष्टि चेतना तक पहुँचाते हैं। इस ऋचा का ध्यान साधक की बुद्धि को विशुद्ध करता है ताकि उसके विचार ऋत (शाश्वत नियम) के अनुकूल हों।

अग्न्याधान तथा नित्य अग्निहोत्र ((Rg. 1-12-1)) में अग्नि को देवों के दूत रूप में वरण करने हेतु प्रयुक्त।

Mantra 4

Devata: Agni · Rishi: Bharadvaja Barhaspatya

अ॒ग्निर्वृ॒त्राणि॑ जङ्घनद् द्रविण॒स्युर्वि॑प॒न्यया॑ | समि॑द्धः शु॒क्र आहु॑तः ||

अग्नि यहाँ 'वृत्रहन्' (अज्ञान और मोहात्मक बाधाओं के विनाशक) के रूप में वर्णित हैं। 'समिद्धः शुक्रः' प्रदीप्त और विशुद्ध ज्ञान-अग्नि का प्रतीक है जो अविद्या के आवरणों को भस्म कर देती है। वेदान्त में यह विवेक के जागरण का सूचक है जो साधक के मन से संशय और भ्रम को जड़ से समाप्त करता है।

साधना में आने वाली मानसिक एवं आध्यात्मिक बाधाओं के निवारणार्थ स्वाध्याय ((Rg. 6-16-34)) में जपनीय।

Mantra 5

Devata: Agni · Rishi: Ushana Kavya

प्रेष्ठं॑ वो॒ अति॑थिं स्तु॒षे मि॒त्रमि॑व प्रि॒यम् | अ॒ग्निं रथं॒ न वेद्य॑म् ||

Prestham vo atithim stuse mitram iva priyam. Agne ratham na vedyam.

अग्नि को 'अतिथि' और 'मित्रम् इव प्रियम्' (सच्चे मित्र की भाँति प्रिय) कहकर संबोधित किया गया है। वैदिक दर्शन में शरीर एक देवालय है और हृदय वह अतिथि-गृह है जहाँ परमात्मा निवास करते हैं। अग्नि को 'मित्र' मानना कर्मकाण्ड को सख्य-भाव (परमेश्वर से आत्मीयता) में परिवर्तित कर देता है।

गृहस्थ यज्ञ विधान एवं अनिकेतन स्वाध्याय ((Rg. 8-84-1)) में परमेश्वर को हृदय-वेदी पर प्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त।

Mantra 6

Devata: Agni · Rishi: Sudīti / Purumīḷha Āṅgirasa

त्वं नो॑ अग्ने॒ महो॑भिः पा॒हि विश्व॑स्या॒ अरा॑तेः | उ॒त द्वि॒षो मर्त्य॑स्य ||

अग्नि को 'अराति' (कृपणता, संकीर्णता व अदेयता की वृत्ति) और 'द्विषः' (द्वेष व शत्रुता) से रक्षा के लिए पुकारा गया है। दार्शनिक दृष्टि से, ईर्ष्या और कंजूसी अज्ञान एवं द्वैत-भाव से उत्पन्न होती हैं। जब साधक के अंदर 'महस्' (आत्म-ज्ञान का महान प्रकाश) प्रदीप्त होता है, तो वह संपूर्ण प्राणियों में एक ही आत्मा को देखता है, जिससे समस्त द्वेष और शत्रुता स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

अग्निहोत्र एवं दैनिक पाठ ((Rg. 8-71-1)) में मन के द्वेष व संकीर्णता के निवारण हेतु प्रयुक्त।

Mantra 7

Devata: Agni · Rishi: Bharadvaja Barhaspatya

एह्यू॒ षु ब्रवा॑णि॒ ते ऽग्न॑ इ॒त्थेत॑रा॒ गिर॑: | ए॒भिर्व॑र्धास॒ इन्दु॑भिः ||

ऋषि भरद्वाज यहाँ अग्नि का आह्वान करते हुए कहते हैं कि 'समीप आओ ताकि मैं तुमसे उच्चतर ज्ञान की बात करूँ'। 'एभिः वर्धस इन्दुभिः' पद यह दर्शाता है कि भक्ति रस के स्वादु बिन्दुओं (इन्दु) से ज्ञान-अग्नि प्रदीप्त होती है। वेदान्त के अनुसार, केवल शुष्क तर्क से नहीं, बल्कि जब स्वाध्याय में भक्ति और रस का समावेश होता है, तभी वास्तविक आत्म-विकास संभव है।

सोमयाग एवं विशिष्ट स्वाध्याय ((Rg. 6-16-16)) में भक्ति-रस के अर्पण एवं ज्ञान-वृद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 8

Devata: Agni · Rishi: Vatsa Kanva

आ ते॑ व॒त्सो मनो॑ यमत्पर॒माच्चि॑त्स॒धस्था॑त् | अग्ने॒ त्वांका॑मया गि॒रा

ऋषि वत्स कण्व यहाँ बछड़े (वत्स) की भाँति निष्पाप भाव से परमात्मा को परम धाम (*परमात् चित् सधस्थात्*) से आकर्षित करते हैं। 'त्वां कामया गिरा' पद उस वाणी का सूचक है जो केवल आत्म-साक्षात्कार (मुमुक्षुत्व) की तीव्र उत्कंठा से भरी है। वेदान्त के अनुसार, जब चंचल मन सांसारिक विषयों से हटकर केवल ईश्वर की ओर एकाग्र होता है, तो परम चेतना साधक के हृदय में अवतरित होती है।

उपासना एवं संध्या काल ((Rg. 8-11-7)) में चित्त को परम धाम से जोड़ने और आत्म-ध्यान हेतु प्रयुक्त।

Mantra 9

Devata: Agni · Rishi: Bharadvaja Barhaspatya

त्वाम॑ग्ने॒ पुष्क॑रा॒दध्यथ॑र्वा॒ निर॑मन्थत | मू॒र्ध्नो विश्व॑स्य वा॒घत॑: ||

Tvam agne puskardad adhyatharva niraman- thata. Murdhno visvasya vaghatah.

यह सुप्रसिद्ध ऋचा ऋषि अथर्वा द्वारा विश्व के मस्तक रूपी कमल (*पुष्करात्*) से अग्नि का मंथन करने का वर्णन करती है। आध्यात्मिक रूप से, 'पुष्कर' हृदय-कमल है और 'निरमंथत' आत्म-विचार और ध्यान रूपी मंथन है। जब साधक मनन और विवेक रूपी अरणि-काष्ठ का मंथन करता है, तो उसके भीतर ढकी हुई आत्म-ज्योति (शुद्ध चेतना) प्रकट होती है।

श्रौत यज्ञों में अरणि-मंथन द्वारा अग्नि प्रकट करते समय ((Rg. 6-16-13)) विशेष रूप से जपनीय।

Mantra 10

Devata: Agni · Rishi: Vamadeva

र, अग्ने विवस्वदा भरास्मभ्यमूतये महे । देवो ह्यसि नो ९०॥

Agne vivasvadabharasmabhyam utaye mahe.

अग्नि को 'सम्राजन्तम् अध्वराणाम्' (अहिंसक यज्ञों के चक्रवर्ती सम्राट) और 'यज्ञानाम् रथीम्' (यज्ञीय रथ के सारथी) के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। 'अध्वर' का अर्थ है जिसमें हिंसा या संकीर्णता न हो। दार्शनिक रूप से, जब मनुष्य के कर्म अहिंसा और लोक-संग्रह से युक्त होते हैं, तब परमात्मा स्वयं उसकी जीवन-यात्रा के सारथी बन जाते हैं।

राजसूय तथा सोमयाग ((Rg. 1-27-1)) में अग्नि को यज्ञ-सम्राट रूप में स्थापित करने हेतु प्रयुक्त।

Mantra 11

Devata: Agni · Rishi: Ayunksvahih

नम॑स्ते अग्न॒ ओज॑से गृ॒णन्ति॑ देव कृ॒ष्टय॑: | अमै॑र॒मित्र॑मर्दय ||

Namaste agna ojase grnanti deva krstayah. Amair amitram ardaya.

मंत्र का प्रारंभ 'नमस्ते अग्न ओजसे' (हे अग्नि, आपके ओजस्वी स्वरूप को नमस्कार है) से होता है। 'अमैर् अमित्रम् अर्दय' परमात्मा से अंतःकरण के शत्रुओं (काम, क्रोध, मोह व अविद्या रूपी अमित्रे) का दमन करने की याचना है। वेदान्त में 'ओजस्' संयम और ध्यान से उत्पन्न आत्मिक बल है। जब साधक परमेश्वर के ओज का आश्रय लेता है, तो उसकी समस्त मानसिक अशुद्धियाँ भस्म हो जाती हैं।

अग्निहोत्र एवं स्वाध्याय ((Rg. 8-75-10)) में आत्म-बल (ओजस्) की वृद्धि और मानसिक विकारों के नाश हेतु प्रयुक्त।

Mantra 12

Devata: Agni · Rishi: Vamadeva Gautama

दू॒तं वो॑ वि॒श्ववे॑दसं हव्य॒वाह॒मम॑र्त्यम् | यजि॑ष्ठमृञ्जसे गि॒रा ||

Dutam vo visvavedasatn havyavaham amar-

ऋषि वामदेव गौतम यहाँ अग्नि से 'विवस्वदा भरा' (हमारे लिए उस जाज्वल्यमान ज्ञान-प्रकाश को धारण कीजिए) की प्रार्थना करते हैं। 'देवो ह्यसि नो दृशे' का अर्थ है कि आप साधक के दिव्य नयनों (*दृशि*) के लिए प्रत्यक्ष परमात्मा हैं। वेदान्त में 'विवस्वत्' अज्ञान रूपी आवरण को हटाकर प्रकट होने वाले ज्ञान-सूर्य का प्रतीक है।

प्रातः संध्या तथा अग्निहोत्र ((Rg. 4-8-1)) में दिव्य दृष्टि और विवेक-प्रकाश की प्राप्ति हेतु जपनीय।

Mantra 13

Devata: Agni · Rishi: Prayoga Bhargava

उप॑ त्वा जा॒मयो॒ गिरो॒ देदि॑शतीर्हवि॒ष्कृत॑: | वा॒योरनी॑के अस्थिरन् ||

ऋषि प्रयोग भार्गव यहाँ दर्शाते हैं कि कैसे साधक की वाणी (*गिरः*) और भक्तिपूर्ण आहुतियाँ सूक्ष्म प्राण वायु (*वायुः अनीके*) में प्रतिष्ठित होती हैं। 'भगिनी स्वरूप ऋचाएँ' मन की विशुद्ध वृत्तियों का प्रतीक हैं जो समष्टि प्राण से एकाकार होती हैं। दार्शनिक रूप से, यह मंत्र सिखाता है कि जब हमारी श्वास और विचार मंत्र-ध्वनि से लयात्मक होते हैं, तब साधक समष्टि चेतना का अनुभव करता है।

अन्तरिक्ष लोक तथा प्राण-वायु की शुद्धि एवं स्तवन हेतु यज्ञ विधान ((Rg. 8-102-13)) में प्रयुक्त।

Mantra 14

Devata: Agni · Rishi: Madhucchanda

उप॑ त्वाग्ने दि॒वेदि॑वे॒ दोषा॑वस्तर्धि॒या व॒यम् | नमो॒ भर॑न्त॒ एम॑सि ||

Upa tvagne dive-dive dosavastar dhiya vayam.

ऋषि मधुच्छन्दा का यह प्रसिद्ध मंत्र (ऋग्वेद 1-1-7) नित्य भक्ति और निरंतर आत्म-समर्पण का मार्ग दर्शाता है। 'दिवेदिवे' (प्रतिदिन) और 'दोषावस्तर्' (अज्ञान-रात्रि को मिटाने वाले) पद यह सिखाते हैं कि जीवन के सुख-दुःख रूपी द्वंद्वों में निरंतर ज्ञान-प्रकाश का ध्यान करना चाहिए। अपनी बुद्धि (*धिया*) से नमन करते हुए साधक अपने अहंकार को परमात्मा के श्रीचरणों में समर्पित करता है।

दैनिक अग्निहोत्र तथा संध्यावंदन ((Rg. 1-1-7)) में प्रातः-सायं काल संधिकाल पर मन और बुद्धि की शुद्धि हेतु विशेष रूप से जपनीय।

Mantra 15

Devata: Agni · Rishi: Ajigarti Shunahshepa

जरा॑बोध॒ तद् वि॑विड्ढि वि॒शेवि॑शे य॒ज्ञिया॑य | स्तोमं॑ रु॒द्राय॒ दृशी॑कम् ||

ऋषि अजीगर्त शुनःशेप अग्नि को 'जराबोध' (अज्ञान की नींद से जगाने वाले) के रूप में पुकारते हैं। यहाँ 'रुद्र' परमात्मा के उस उग्र व कल्याणकारी स्वरूप का प्रतीक है जो साधक के आलस्य और अज्ञान को भस्म करता है। यह स्तुति (*स्तोम*) 'दृशीकम्' (सच्ची दृष्टि प्रदान करने वाली) है, जो साधक को केवल बाह्य जगत देखने के बजाय आंतरिक आत्म-साक्षात्कार (*अपरोक्ष अनुभूति*) की ओर ले जाती है।

सोमयाग एवं विशिष्ट स्वाध्याय ((Rg. 1-27-10)) में आत्म-जागृति और विवेक-दृष्टि प्राप्त करने हेतु प्रयुक्त।

Mantra 16

Devata: Agni Marutah · Rishi: Kanva Medhatithi

प्रति॒ त्यं चारु॑मध्व॒रं गो॑पी॒थाय॒ प्र हू॑यसे | म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि ||

ऋषि कण्व मेधातिथि अग्नि का मरुतों (समष्टि प्राण-शक्तियों) के साथ आह्वान करते हैं। 'चारुम् अध्वरम्' सुंदर और अहिंसक यज्ञीय जीवन का प्रतीक है। अध्यात्म की दृष्टि से, केवल ज्ञान (अग्नि) पर्याप्त नहीं है; जब तक उसे क्रियाशील प्राण-शक्ति (मरुत) का सहयोग नहीं मिलता, साधना पूर्ण नहीं होती।

सोमयाग एवं मरुत्वतीय शस्त्र पाठ ((Rg. 1-19-1)) में ज्ञान और प्राण-शक्ति के एकीकरण हेतु प्रयुक्त।

Mantra 17

Devata: Agni · Rishi: Ajigarti Shunahshepa

अश्वं॒ न त्वा॒ वार॑वन्तं व॒न्दध्या॑ अ॒ग्निं नमो॑भिः | स॒म्राज॑न्तमध्व॒राणा॑म् ||

ऋषि अजीगर्त शुनःशेप यहाँ अग्नि की तुलना 'अश्वं वारवन्तम्' (सघन अयालों वाले ओजस्वी अश्व) से करते हैं। वैदिक प्रतीकात्मकता में 'अश्व' तीव्र प्राण-शक्ति का सूचक है। 'सम्राजन्तम् अध्वराणाम्' पद अग्नि को समस्त अहिंसक यज्ञों के सम्राट के रूप में प्रतिपादित करता है। दार्शनिक दृष्टि से, अपनी प्राण-शक्ति (अश्व) को वश में करके निष्काम कर्म में लगाना ही वास्तविक आत्म-नियंत्रण है।

सोमयाग एवं वाजपेय विधान ((Rg. 1-27-1)) में प्राण-शक्ति के उन्नयन एवं अग्नि-संस्तुति हेतु प्रयुक्त।

Mantra 18

Devata: Agni · Rishi: Prayoga Bhargava

औ॒र्व॒भृ॒गु॒वच्छुचि॑मप्नवान॒वदा हु॑वे | अ॒ग्निं स॑मु॒द्रवा॑ससम् ||

ऋषि प्रयोग भार्गव यहाँ और्व और भृगु ऋषियों की परम्परा में 'समुद्रवाससम्' (समुद्र रूपी अनंत चेतना को वस्त्र रूप में धारण करने वाले) अग्नि का आह्वान करते हैं। 'समुद्र' चिदानंद परमेश्वर की अनंत चेतना का प्रतीक है। वेदान्त के अनुसार, जैसे समुद्र में बड़वानल निहित होती है, वैसे ही सृष्टि के प्रत्येक तत्त्व में चिद्-अग्नि ओत-प्रोत है।

अग्न्याधान तथा जल-प्रोक्षण विधान ((Rg. 8-102-4)) में सर्वव्यापी चिद्-अग्नि की संस्तुति हेतु प्रयुक्त।

Mantra 19

Devata: Agni · Rishi: Prayoga Bhargava

अ॒ग्निमिन्धा॑नो॒ मन॑सा॒ धियं॑ सचेत॒ मर्त्य॑: | अ॒ग्निमी॑धे वि॒वस्व॑भिः ||

यह मंत्र 'ध्यान-योग' और 'अंतर्यज्ञ' का निरूपण करता है। 'अग्निम् इन्धानो मनसा' (मन के द्वारा ज्ञान-अग्नि को प्रदीप्त करना) तथा 'धियं सचेत' (विशुद्ध बुद्धि को परमात्मा से जोड़ना) यह सिखाता है कि वास्तविक अग्निहोत्र आंतरिक है। 'विवस्वद्भिः' पद आत्म-सूर्य की किरणों का सूचक है। वेदान्त के अनुसार, एकाग्र मन से किया गया ध्यान बुद्धि को परम चैतन्य में विलीन कर देता है।

नित्य अग्निहोत्र एवं आंतरिक ध्यान साधना ((Rg. 8-102-22)) में चित्त-वृत्ति निरोध और ज्ञान-दीप्ति हेतु प्रयुक्त।

Mantra 20

Devata: Agni · Rishi: Vatsa Kanva

आदित्प्र॒त्नस्य॒ रेत॑सो॒ ज्योति॑ष्पश्यन्ति वास॒रम् | प॒रो यदि॒ध्यते॑ दि॒वा ||

ऋषि वत्स कण्व यहाँ 'प्रत्नस्य रेतसो ज्योतिः' (ब्रह्म के सनातन बीज-प्रकाश) का साक्षात्कार करते हैं। 'परो यद् इध्यते दिवा' पद उस परम ज्योति का सूचक है जो भौतिक सूर्य और देश-काल से परे देदीप्यमान है। वेदान्त में यह आत्मा की स्वप्रकाशता (स्वयं प्रकाशित स्वरूप) की अनुभूति है। साधक उस अजन्मा, अमर प्रकाश को देखता है जो प्रलय काल में भी अक्षुण्ण रहता है।

ब्रह्मयज्ञ तथा ज्योतिष्टोम विधान ((Rg. 8-6-30)) में परम ज्योति के ध्यान और आत्म-साक्षात्कार हेतु जपनीय।

Mantra 21

Devata: Agni · Rishi: Prayoga Bhargava

अ॒ग्निं वो॑ वृ॒धन्त॑मध्व॒राणां॑ पुरू॒तम॑म् | अच्छा॒ नप्त्रे॒ सह॑स्वते ||

ऋषि प्रयोग भार्गव अग्नि को 'वृधन्तम् अध्वराणाम्' (अहिंसक यज्ञीय कर्मों को बढ़ाने वाले) और 'नप्त्रे सहस्वते' (आगामी पीढ़ियों के लिए बलप्रद) के रूप में वर्णित करते हैं। दार्शनिक रूप से, जब समाज में व्यष्टि अहंकार का त्याग कर समष्टि हित (यज्ञ) के लिए कर्म किया जाता है, तब आध्यात्मिक शक्ति का विस्तार होता है जो भावी पीढ़ियों को सामर्थ्य प्रदान करता है।

वंश-वृद्धि, कुल-यज्ञ एवं समाज-कल्याण विधान ((Rg. 8-102-7)) में संवर्धन व बल-प्राप्ति हेतु प्रयुक्त।

Mantra 22

Devata: Agni · Rishi: Bharadvaja Barhaspatya

अ॒ग्निस्ति॒ग्मेन॑ शो॒चिषा॒ यास॒द् विश्वं॒ न्य१त्रिण॑म् | अ॒ग्निर्नो॑ वनते र॒यिम् ||

ऋषि भरद्वाज अग्नि के 'तिग्मेन शोचिषा' (तीक्ष्ण, प्रदीप्त ज्ञान-ज्वाला) का स्तवन करते हैं जो समस्त 'अत्रिणम्' (अंतःकरण को खाने वाले काम-क्रोध रूपी राक्षसों) को भस्म कर देती है। 'अग्निर् नो वनते रयिम्' पद यह बतलाता है कि अग्नि हमें वास्तविक संपत्ति प्रदान करते हैं। वेदान्त में यह तीक्ष्ण विवेक-ज्ञान है जो हृदय की ग्रंथियों को काटकर मोक्ष रूपी परम धन प्रदान करता है।

रक्षोघ्न यज्ञ एवं शत्रु-बाधा निवारणार्थ स्वाध्याय ((Rg. 6-16-28)) में आत्म-धन की प्राप्ति हेतु जपनीय।

Mantra 23

Devata: Agni · Rishi: Vamadeva Gautama

अग्ने॑ मृ॒ळ म॒हाँ अ॑सि॒ य ई॒मा दे॑व॒युं जन॑म् | इ॒येथ॑ ब॒र्हिरा॒सद॑म् ||

Agne mrda mahain asyaya a devayum janam.

अग्नि की महिमा का गान 'द्यावा-पृथिवी' (आकाश और पृथ्वी) को आच्छादित करने वाले व्यापक स्वरूप के रूप में किया गया है। यहाँ अग्नि वैश्वानर (समष्टि सर्वव्यापी चेतना) हैं। वेदान्त के अनुसार, जब साधक जड़ पदार्थ (पृथ्वी) और चिन्मय चेतना (द्यु) को जोड़ने वाले अग्नि-तत्त्व को पहचानता है, तो वह परिच्छिन्न अहंकार से मुक्त होकर 'सर्वात्मभाव' को प्राप्त होता है।

वैश्वानर याग एवं संक्रांति अनुष्ठान ((Rg. 3-26-1)) में सर्वव्यापक चेतना के ध्यान हेतु प्रयुक्त।

Mantra 24

Devata: Agni · Rishi: Vasishtha Maitravaruni

अग्ने॒ रक्षा॑ णो॒ अंह॑स॒: प्रति॑ ष्म देव॒ रीष॑तः | तपि॑ष्ठैर॒जरो॑ दह ||

Agne raksa no amhasah prati sma deva risatah.

ऋषि भरद्वाज अग्नि को सर्व-शक्तिमान मानकर 'स्तोम' (स्तुति-गीत) अर्पित करते हैं। 'स्तोमेन अग्निम् यजत' पद यह प्रतिपादित करता है कि वाचिक तप और निष्कपट भक्ति (स्तुति) भी ईश्वर-साक्षात्कार का साधन है। दार्शनिक दृष्टि से, परमेश्वर के गुणों का कीर्तन करने से साधक का चित्त शुद्ध होता है और वह निदिध्यासन (गहन ध्यान) के योग्य बनता है।

सोमयाग के स्तोत्र पाठ ((Rg. 6-16-22)) तथा नित्य स्वाध्याय में वाणी की शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 25

Devata: Agni · Rishi: Bharadvaja Barhaspatya

अग्ने॑ यु॒क्ष्वा हि ये तवाऽश्वा॑सो देव सा॒धव॑: | अरं॒ वह॑न्ति म॒न्यवे॑ ||

Agne yunksva hi ye tavasvaso deva sadhavah.

अग्नि से दिन और रात्रि दोनों समय सूक्ष्म एवं स्थूल विघ्नों से 'पाही' (रक्षा) की याचना की गई है। वेदान्त में अग्नि 'साक्षी-चेतना' हैं जो तीनों अवस्थाओं—जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—में जाग्रत रहकर जीव की अज्ञान से रक्षा करती है। संधिकाल में इस ऋचा का ध्यान साधक को अभय और आंतरिक आत्म-स्थिरता प्रदान करता है।

सायं संध्या, रात्रि-सूक्त पाठ एवं अग्निहोत्र ((Rg. 8-71-2)) में शांति एवं अभय-रक्षा हेतु प्रयुक्त।

Mantra 26

Devata: Agni · Rishi: Vasishtha Maitravaruni

नि त्वा॑ नक्ष्य विश्पते द्यु॒मन्तं॑ देव धीमहि | सु॒वीर॑मग्न आहुत ||

अग्नि को 'विप्र' (दिव्य प्रेरणा से युक्त ऋषियों का मेधावी मार्गदर्शक) और 'विशपति' कहा गया है। 'विप्र' शब्द 'विप्' (दिव्य कम्पन्न) से बना है। वेदान्त के अनुसार, अग्नि शब्द-ब्रह्म का वह स्रोत हैं जो ऋषियों के हृदय में मंत्र-दृष्टि और परम सत्य का स्फुरण करते हैं।

सामगान एवं स्तोत्र-पाठ ((Rg. 8-102-14)) में काव्य-प्रेरणा तथा शब्द-शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 27

Devata: Agni · Rishi: Virupa Angirasa

अ॒ग्निर्मू॒र्धा दि॒वः क॒कुत्पति॑: पृथि॒व्या अ॒यम् | अ॒पां रेतां॑सि जिन्वति ||

ऋषि भरद्वाज अग्नि को 'अतिथिं विश्वेषाम्' (समस्त प्राणियों के अंतःकरण में विराजमान अतिथि) और 'पावक-शोचिषम्' (पवित्र करने वाली ज्वाला वाले) कहकर पूजते हैं। 'अतिथि' पद यह बतलाता है कि परमात्मा अनासक्त होकर भी प्रत्येक जीव के हृदय-गृह में निवास करते हैं। शरीर को मंदिर मानकर आंतरिक अतिथि का सत्कार करना ही वास्तविक भक्ति है।

अग्न्याधान तथा अतिथि-सत्कार संस्कार ((Rg. 6-16-42)) में परमात्मा के आंतरिक आवास के ध्यान हेतु जपनीय।

Mantra 28

Devata: Agni · Rishi: Ajigarti Shunahshepa

इ॒ममू॒ षु त्वम॒स्माकं॑ स॒निं गा॑य॒त्रं नव्यां॑सम् | अग्ने॑ दे॒वेषु॒ प्र वो॑चः ||

अग्नि को 'रथीम् अध्वराणाम्' (यज्ञीय यात्रा के सारथी) के रूप में स्तुत किया गया है। यह कठोपनिषद् के 'बुद्धिं तु सारथिं विद्धि' (बुद्धि ही शरीर रूपी रथ का सारथी है) का वैदिक मूल है। जब अग्नि रूपी ज्ञान से बुद्धि प्रकाशित होती है, तो वह मनुष्य की जीवन-यात्रा को विषय-विकारों से सुरक्षित बचाकर मोक्ष पद तक पहुँचाती है।

सोमयाग एवं रथ-प्रतिष्ठा अनुष्ठान ((Rg. 8-60-12)) में बुद्धि के सम््यक्-मार्गदर्शन हेतु प्रयुक्त।

Mantra 29

Devata: Agni · Rishi: Gopavana Atreya

यं त्वा॑ गो॒पव॑नो गि॒रा चनि॑ष्ठदग्ने अङ्गिरः | स पा॑वक श्रुधी॒ हव॑म् ||

Tam tva gopavano gira janisthad agne

ऋषि भरद्वाज यहाँ 'पाहि नः अग्ने राक्षसः' (हे अग्नि, नकारात्मक आसुरी शक्तियों से हमारी रक्षा करें) की प्रार्थना करते हैं। 'राक्षस' आध्यात्मिक रूप से अज्ञान, द्वेष, संकीर्णता और तामसिक वृत्तियों के प्रतीक हैं। वेदान्त के अनुसार, विवेक-अग्नि साधक के अंतःकरण के लिए एक अभेद्य कवच (रक्षा-कवच) का कार्य करती है।

रक्षोघ्न यज्ञ एवं सायं संध्या पाठ ((Rg. 6-16-30)) में आसुरी वृत्तियों के विनाश और अभय-रक्षा हेतु प्रयुक्त।

Mantra 30

Devata: Agni · Rishi: Vamadeva Gautama

परि॒ वाज॑पतिः क॒विर॒ग्निर्ह॒व्यान्य॑क्रमीत् | दध॒द् रत्ना॑नि दा॒शुषे॑ ||

अग्नि की स्तुति 'सहजः' (आंतरिक तपोबल से प्रकट) और 'सखा' (सनातन दिव्य मित्र) के रूप में की गई है। यहाँ वेदान्त के 'सख्य-भाव' का निरूपण है। ईश्वर को किसी भयभीत करने वाले शासक के रूप में नहीं, बल्कि अपने ही अंतःकरण में विराजमान 'सखा' के रूप में अनुभव करना साधक को अपार आत्म-विश्वास और शांति प्रदान करता है।

उपासना तथा नित्य स्वाध्याय ((Rg. 8-60-14)) में सख्य-भाव की परिपक्वता एवं आत्म-बल प्राप्ति हेतु जपनीय।

Mantra 31

Devata: Surya · Rishi: Praskanva

उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तव॑: | दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्य॑म् ||

अग्नि को 'जातवेदस्' (उत्पन्न हुए समस्त प्राणियों को जानने वाले व वेद-ज्ञान के स्रोत) के रूप में पूजा गया है। 'जातवेदस्' सर्वज्ञ परमेश्वर और जीवन की सूक्ष्म चैतन्य-अग्नि का प्रतीक है। वेदान्त के अनुसार, यह सर्वज्ञ ब्रह्म का स्वरूप है जो प्राणियों में 'प्राण' के रूप में और साधक की बुद्धि में 'स्फुरण' (ज्ञान की आभ्यंतर दीप्ति) के रूप में उदित होता है।

अग्न्याधान तथा नित्य संध्या पाठ ((Rg. 6-16-29)) में आत्म-ज्ञान एवं प्रज्ञा-वृद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 32

Devata: Agni · Rishi: Kanva Medhatithi

क॒विम॒ग्निमुप॑ स्तुहि स॒त्यध॑र्माणमध्व॒रे | दे॒वम॑मीव॒चात॑नम् ||

अग्नि की स्तुति 'पावक' (पवित्र करने वाले) और 'शुक्रवर्णस्' (विशुद्ध श्वेत प्रकाश वाले) के रूप में की गई है। 'पावक' का अर्थ है जो मलिनता को जलाकर निर्मल कर दे। वेदान्त में, 'चित्त-शुद्धि' आत्म-साक्षात्कार की अनिवार्य पूर्व-शर्त है। विवेक रूपी पावक की ज्वाला साधक के वासना-मल को भस्म कर आत्मा की स्वाभाविक विशुद्धता को प्रकट करती है।

पावमान सूक्त पाठ एवं अग्निहोत्र ((Rg. 8-60-15)) में अंतःकरण की त्रिविध शुद्धि हेतु जपनीय।

Mantra 33

Devata: Apah · Rishi: Triśiras Tvāṣṭra; or Sindhudvīpa Āmbarīṣa

शं नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ आपो॑ भवन्तु पी॒तये॑ | शं योर॒भि स्र॑वन्तु नः ||

ऋषि भरद्वाज अग्नि को 'व्रतपति' (पवित्र संकल्पों व नियमों के स्वामी) के रूप में पुकारते हैं। वैदिक संस्कृति में 'व्रत' सत्य-निष्ठा, आत्म-संयम और नैतिक संकल्प का सूचक है। वेदान्त के अनुसार, यम-नियम और व्रत-पालन के बिना आत्म-ज्ञान संभव नहीं है। अग्नि को 'व्रतपति' मानकर प्रार्थना करने से साधक का सत्य-संकल्प सुदृढ़ होता है।

दीक्षा, व्रत-धारण एवं यज्ञोपवीत संस्कार ((Rg. 8-11-1)) में संकल्प-सिद्धि व नियम-पालन हेतु प्रयुक्त।

Mantra 34

Devata: Agni · Rishi: Ushana Kavya

कस्य॑ नू॒नं परी॑णसो॒ धियो॑ जिन्वसि दम्पते | गोषा॑ता॒ यस्य॑ ते॒ गिर॑: ||

अग्नि को 'कविक्रतुः' (क्रांतदर्शी प्रज्ञा और अमोघ संकल्प वाले) और 'सत्यः' (त्रिकाल अबाधित सत्य) कहा गया है। 'कवि' का अर्थ है दूरदर्शी तत्त्वज्ञानी, और 'क्रतु' का अर्थ है संकल्प-शक्ति। वेदान्त में, 'कविक्रतु' दिव्य प्रज्ञा और क्रिया-शक्ति के एकीकरण का प्रतीक है जो साधक के संदेहों को मिटाकर उसे प्रत्यक्ष सत्य-साक्षात्कार कराता है।

मेधा-जनन संस्कार एवं प्रातः स्वाध्याय ((Rg. 1-1-5)) में ऋतंभरा प्रज्ञा की प्राप्ति हेतु जपनीय।

Mantra 35

Devata: Agni · Rishi: Shamyu Barhaspatya

य॒ज्ञाय॑ज्ञा वो अ॒ग्नये॑ गि॒रागि॑रा च॒ दक्ष॑से | प्रप्र॑ व॒यम॒मृतं॑ जा॒तवे॑दसं प्रि॒यं मि॒त्रं न शं॑सिषम्

ऋषि भरद्वाज अग्नि को 'शरण्यम्' (सर्वोच्च आश्रयदाता) के रूप में पुकारते हैं। यहाँ वेदान्त के 'शरणागति' (पूर्ण आत्म-समर्पण) का संदेश है। जब जीव अपने अहंकार का त्याग कर परमेश्वर की शरण में जाता है, तो उसके सारे भय और संताप नष्ट हो जाते हैं और वह अभय पद (परम शांति) को प्राप्त करता है।

शरणागति प्रार्थना एवं संकट-निवारण पाठ ((Rg. 6-16-40)) में सर्व-रक्षा व आत्म-शांति हेतु प्रयुक्त।

Mantra 36

Devata: Agni · Rishi: Bharga Pragatha

पा॒हि नो॑ अग्न॒ एक॑या पा॒ह्यु१त द्वि॒तीय॑या | पा॒हि गी॒र्भिस्ति॒सृभि॑रूर्जां पते पा॒हि च॑त॒सृभि॑र्वसो ||

अग्नि को 'अन्नपति' (अन्न और पोषण के अधिपति) और जठराग्नि के रूप में पूजा गया है। तैत्तिरीय उपनिषद् में 'अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्' (अन्न ही ब्रह्म है) कहा गया है। वेदान्त के अनुसार, अन्नपति वह दिव्य चेतना है जो बाह्य अन्न को सूक्ष्म प्राण-शक्ति में बदलकर अन्नमय कोष को स्वस्थ व चैतन्य रखती है।

अन्नप्राशन, भोजन-मंत्र तथा अग्निहोत्र ((Rg. 8-102-1)) में आरोग्य व प्राण-पुष्टि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 37

Devata: Agni · Rishi: Shamyu Barhaspatya

बृ॒हद्भि॑रग्ने अ॒र्चिभि॑: शु॒क्रेण॑ देव शो॒चिषा॑ | भ॒रद्वा॑जे समिधा॒नो य॑विष्ठ्य रे॒वन्न॑: शुक्र दीदिहि द्यु॒मत्पा॑वक दीदिहि

Brhadbhir agne arcibhih sukrena deva Socisa.

ऋषि भरद्वाज अग्नि को 'विश्वचर्षणि' (समस्त मानव समाज के सर्वद्रष्टा मार्गदर्शक) और 'विश्वेषाम् हित' कहकर पुकारते हैं। यह मंत्र 'वसुधैव कुटुंबकम्' की वैदिक नींव है। वेदान्त के अनुसार, आत्म-ज्योति किसी एक संप्रदाय तक सीमित नहीं है; यह संपूर्ण प्राणियों में समभाव से विराजमान एक ही परमेश्वर का स्वरूप है।

विश्वेदेव यज्ञ तथा शांति-पाठ ((Rg. 6-16-1)) में सर्व-कल्याण और वैश्विक सौहार्द हेतु जपनीय।

Mantra 38

Devata: Agni · Rishi: Vasishtha Maitravaruni

त्वे अ॑ग्ने स्वाहुत प्रि॒यास॑: सन्तु सू॒रय॑: | य॒न्तारो॒ ये म॒घवा॑नो॒ जना॑नामू॒र्वान्दय॑न्त॒ गोना॑म् ||

Tve agne svahuta priyasah santu surayah.

अग्नि को 'केतुः यज्ञानाम्' (यज्ञों की सर्वोच्च पताका व प्रकाश-पुंज) कहा गया है। वैदिक भाषा में 'केतु' चैतन्य के प्रकटीकरण का सूचक है। वेदान्त के अनुसार, यह अंतःकरण में कौंधने वाली 'प्रतिभा' (आंतरिक दिव्य दृष्टि) है जो अज्ञान के अंधकार को चीरकर आत्मा को मोक्ष के तट पर पहुँचाती है।

केतु-स्थापन तथा प्रातः-स्वाध्याय ((Rg. 3-27-11)) में दिव्य प्रेरणा व मार्गदर्शन हेतु प्रयुक्त।

Mantra 39

Devata: Agni · Rishi: Bhardvaja

अग्ने॒ जरि॑तर्वि॒श्पति॑स्तेपा॒नो दे॑व र॒क्षस॑: | अप्रो॑षिवान्गृ॒हप॑तिर्म॒हाँ अ॑सि दि॒वस्पा॒युर्दु॑रोण॒युः ||

ऋषि भरद्वाज यहाँ 'ध्रुवम्' (अचल आत्म-स्थिति) और 'सहस्' (अद्वैत बल) के लिए अग्नि का आह्वान करते हैं। 'ध्रुव' मानव अनुभव में निर्विकार कूटस्थ ब्रह्म का प्रतीक है। वेदान्त के अनुसार, यद्यपि संसार चंचल है, किंतु जो साधक अपने साक्षी स्वरूप में स्थित रहता है, वह 'स्थितप्रज्ञ' होकर अटूट शांति प्राप्त करता है।

ध्रुव-आवाहन तथा मानसिक-स्थिरता अनुष्ठान ((Rg. 6-16-19)) में स्थितप्रज्ञता प्राप्ति हेतु जपनीय।

Mantra 40

Devata: Agni · Rishi: Praskanva Kanva

अग्ने॒ विव॑स्वदु॒षस॑श् चि॒त्रं राधो॑ अमर्त्य | आ दा॒शुषे॑ जातवेदो वहा॒ त्वम॒द्या दे॒वाँ उ॑ष॒र्बुध॑: ||

Agne vivasvadusasaScitram radho amartya.

ऋषि मधुच्छन्दा का यह परम पावन मंत्र (ऋग्वेद 1-1-9) परमात्मा से आत्मीय संबंध प्रकट करता है: 'स नः पितेव सूनवे अग्ने सूपायनो भव' (हे अग्नि, जैसे पिता अपने पुत्र के लिए सुलभ होता है, वैसे ही आप हमारे लिए सहज-सुलभ हो जाइए)। 'सूपायन' शब्द प्रेम-भक्ति के द्वारा परमेश्वर की सुलभता का सूचक है। यहाँ वात्सल्य-भाव का वेदान्तिक निरूपण है।

दैनिक अग्निहोत्र एवं संध्या के समापन ((Rg. 1-1-9)) में परमेश्वर से परम आत्मीयता व शांति प्रार्थना हेतु प्रयुक्त।

Mantra 41

Devata: Agni · Rishi: Shamyu Trinapani

त्वं न॑श्चि॒त्र ऊ॒त्या वसो॒ राधां॑सि चोदय | अ॒स्य रा॒यस्त्वम॑ग्ने र॒थीर॑सि वि॒दा गा॒धं तु॒चे तु न॑:

ऋषि भरद्वाज यहाँ 'पाहि नः अग्ने अमतेः' (हे अग्नि, हमें अज्ञान और विवेकहीनता से बचाइए) की प्रार्थना करते हैं। 'अमति' का अर्थ है अज्ञान या प्रज्ञा का अभाव (अविद्या)। वेदान्त के अनुसार, अमति ही समस्त दुःखों और जन्म-मरण के बंधन की मूल जड़ है। जब साधक ज्ञान-दीपक रूपी अग्नि को अपने भीतर प्रज्वलित करता है, तो अज्ञान का अंधकार पूरी तरह मिट जाता है।

अग्निहोत्र तथा प्रातः-सायं संध्या पाठ ((Rg. 6-16-30)) में अज्ञान-निवारण एवं मेधा-रक्षा हेतु प्रयुक्त।

Mantra 42

Devata: Agni · Rishi: Bharga Pragatha

त्वमित्स॒प्रथा॑ अ॒स्यग्ने॑ त्रातॠ॒तस्क॒विः | त्वां विप्रा॑सः समिधान दीदिव॒ आ वि॑वासन्ति वे॒धस॑: ||

Tvam it sapratha asyagne tratar rtah kavih.

अग्नि की स्तुति 'सधस्थे प्रथमो यज्ञियानाम्' (वेदी पर स्थापित प्रथम पूज्य देव) के रूप में की गई है। प्रतीकात्मक रूप से, 'वेदी' साधक का विशुद्ध अंतःकरण है और 'अग्नि' उसमें विराजमान अंतर्यामी आत्मा हैं। वेदान्त में, बाह्य यज्ञ आंतरिक मानस-यज्ञ का प्रतीक है, जहाँ संकल्प-विकल्पों को आत्मा की अचल ज्वाला में होम दिया जाता है।

अग्न्याधान तथा वेदी-प्रतिष्ठा विधान ((Rg. 8-102-17)) में अंतर्यामी परमात्मा की स्थापना हेतु प्रयुक्त।

Mantra 43

Devata: Agni · Rishi: Bharga Pragatha

आ नो॑ अग्ने वयो॒वृधं॑ र॒यिं पा॑वक॒ शंस्य॑म् | रास्वा॑ च न उपमाते पुरु॒स्पृहं॒ सुनी॑ती॒ स्वय॑शस्तरम् ||

A no agne vayovrdham rayim pavaka Samsyam.

अग्नि का आह्वान 'सुभग' (परम मंगलमय ऐश्वर्य देने वाले) और 'वयस्कृत' (प्राण-शक्ति को नित्य नवीन करने वाले) के रूप में किया गया है। वैदिक दर्शन में 'भग' आत्मिक आनंद और आरोग्य का प्रतीक है। धर्मानुकूल जीवन जीने से साधक की प्राणाग्नि दीप्त होती है जो शरीर को निज-आरोग्य और मन को सात्विक प्रसन्नता से भर देती है।

आयुष्य-सूक्त पाठ एवं नित्य अग्निहोत्र ((Rg. 8-60-1)) में दीर्घायु व स्वास्थ्य-प्राप्ति हेतु जपनीय।

Mantra 44

Devata: Agni · Rishi: Saubahri Kanva

यो विश्वा॒ दय॑ते॒ वसु॒ होता॑ म॒न्द्रो जना॑नाम् | मधो॒र्न पात्रा॑ प्रथ॒मान्य॑स्मै॒ प्र स्तोमा॑ यन्त्य॒ग्नये॑ ||

Yo visva dayate vasu hota mandro jananam.

अग्नि को 'अध्वर-सेतु' (अहिंसक यज्ञीय कर्मों का सार्वभौम सेतु) कहा गया है। मुण्डकोपनिषद् में परमात्मा को 'अमृतस्यैष सेतुः' (अमृतत्व तक पहुँचाने वाला सेतु) कहा गया है। वेदान्त के अनुसार, निष्काम कर्मयोग वह सेतु है जो साधक को संसार-सागर के जन्म-मरण चक्र से तारकर नित्य अमृत स्वरूप (मोक्ष) तक पहुँचाता है।

श्रौत यज्ञ एवं सेतु-मंत्र पाठ ((Rg. 8-102-18)) में मोक्ष-मार्ग पर अग्रसर होने के लिए प्रयुक्त।

Mantra 45

Devata: Agni · Rishi: Vasishtha Maitravaruni

ए॒ना वो॑ अ॒ग्निं नम॑सो॒र्जो नपा॑त॒मा हु॑वे | प्रि॒यं चेति॑ष्ठमर॒तिं स्व॑ध्व॒रं विश्व॑स्य दू॒तम॒मृत॑म् ||

Ena vo agnim namasorjo napatam a huve.

ऋषि भरद्वाज यहाँ 'मन्यु' (क्रोध व उग्र मानसिक अशांति) के शमन हेतु अग्नि की स्तुति करते हैं। 'अग्ने समया अस्मद्-द्विषः' पद परमात्मा से विनाशकारी क्रोध को शांत करके उसे क्षमा और विवेक में बदलने की प्रार्थना है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार क्रोध आत्म-विनाश का द्वार है; अतः विवेक-अग्नि द्वारा क्रोध का शमन करके चित्त-प्रसाद (शांति) प्राप्त करने का संदेश यहाँ है।

शांति-पाठ तथा मानसिक-उपशम अनुष्ठान ((Rg. 6-16-39)) में क्रोध-निवारण एवं चित्त-शांति हेतु जपनीय।

Mantra 46

Devata: Agni · Rishi: Bharga Pragatha

शेषे॒ वने॑षु मा॒त्रोः सं त्वा॒ मर्ता॑स इन्धते | अत॑न्द्रो ह॒व्या व॑हसि हवि॒ष्कृत॒ आदिद्दे॒वेषु॑ राजसि ||

अग्नि को 'गृहपति' (परिवार व गृहस्थी के स्वामी) और 'अमृत-विश्व-वेदाः' के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। वैदिक व्यवस्था में गृहस्थाश्रम समाज का मुख्य आधार है। 'गृहपति' पद यह बतलाता है कि पारिवारिक संबंधों में भी परमेश्वर ही मुख्य अधिष्ठाता हैं। गृहस्थ जीवन को साधना मानकर जीने से पारिवारिक कर्मबंधन कटते हैं और आत्म-विकास होता है।

गृहप्रवेश, वास्तु-यज्ञ तथा नित्य अग्निहोत्र ((Rg. 8-60-19)) में पारिवारिक उन्नति व सामंजस्य हेतु प्रयुक्त।

Mantra 47

Devata: Agni · Rishi: Saubahri Kanva

अद॑र्शि गातु॒वित्त॑मो॒ यस्मि॑न्व्र॒तान्या॑द॒धुः | उपो॒ षु जा॒तमार्य॑स्य॒ वर्ध॑नम॒ग्निं न॑क्षन्त नो॒ गिर॑: ||

ऋषि भरद्वाज अग्नि की स्तुति 'वैश्वानर' (समस्त मानव जाति में विद्यमान सार्वभौम अग्नि) और 'नरपा' (मनुष्यों के रक्षक) के रूप में करते हैं। छांदोग्योपनिषद् में 'वैश्वानर आत्मा' का वर्णन है जो संपूर्ण ब्रह्मांडीय चेतना का व्यष्टि में स्वरूप है। वेदान्त के अनुसार, वैश्वानर का साक्षात्कार करने से साधक परिच्छिन्न अहंकार से परे हटकर सर्व-भूतात्मभाव को प्राप्त होता है।

वैश्वानर याग एवं आत्म-उपासना ((Rg. 6-16-41)) में सर्व-भूतात्मभाव और परमेश्वर के व्यापक स्वरूप के ध्यान हेतु जपनीय।

Mantra 48

Devata: Agni · Rishi: Manu Vaivasvata

अ॒ग्निरु॒क्थे पु॒रोहि॑तो॒ ग्रावा॑णो ब॒र्हिर॑ध्व॒रे | ऋ॒चा या॑मि म॒रुतो॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिं॑ दे॒वाँ अवो॒ वरे॑ण्यम् ||

अग्नि को 'शुचि' (सदा विशुद्ध, असंग) और 'वीपाप्मा' (पाप-रहित) के रूप में पूजा गया है। अग्नि सब वस्तुओं को भस्म करके पवित्र कर देती है, किंतु स्वयं कभी अशुद्ध नहीं होती। वेदान्त में यह आत्मा के 'नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त' स्वरूप का प्रतीक है। जैसे अग्नि काष्ठ के गुणों से लिप्त नहीं होती, वैसे ही आत्मा बुद्धि और शरीर के विकारों से असंग रहती है।

पावमान सूक्त पाठ तथा आत्म-शुद्धि विधान ((Rg. 8-60-21)) में आत्मा के असंग स्वरूप के ध्यान हेतु प्रयुक्त।

Mantra 49

Devata: Agni · Rishi: Suditi - Purumidhau Angirasau

अ॒ग्निमी॑ळि॒ष्वाव॑से॒ गाथा॑भिः शी॒रशो॑चिषम् | अ॒ग्निं रा॒ये पु॑रुमीळ्ह श्रु॒तं नरो॒ऽग्निं सु॑दी॒तये॑ छ॒र्दिः ||

अग्नि को 'पुरंभेत्ता' (अज्ञान रूपी सुदृढ़ दुर्गों को ध्वस्त करने वाले) के रूप में पुकारा गया है। वेदान्त में 'पुर' तीन शरीरों—स्थूल, सूक्ष्म और कारण—अथवा अहंकार के दुर्ग (अहं-पुर) का सूचक है। 'पुरंभेत्ता' का अर्थ है उस ज्ञान-अग्नि का उदित होना जो अहंकार के किले को तोड़कर जीव को कैवल्य (परम मुक्ति) प्रदान करती है।

रक्षोघ्न यज्ञ एवं मोक्ष-साधना पाठ ((Rg. 8-60-8)) में अज्ञान-दुर्ग के भंजन व अभय-लाभ हेतु जपनीय।

Mantra 50

Devata: Agni · Rishi: Praskanva Kanva

श्रु॒धि श्रु॑त्कर्ण॒ वह्नि॑भिर्दे॒वैर॑ग्ने स॒याव॑भिः | आ सी॑दन्तु ब॒र्हिषि॑ मि॒त्रो अ॑र्य॒मा प्रा॑त॒र्यावा॑णो अध्व॒रम् ||

अग्नि को 'श्रुष्टिवान्' (सच्ची प्रार्थनाओं को तुरंत सुनने व स्वीकार करने वाले) और 'वज्रबाहु' कहा गया है। 'श्रुष्टि' निश्छल भक्ति का त्वरित दिव्य उत्तर है। केनोपनिषद् के अनुसार ब्रह्म 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' (कानों का भी कान, सर्व-श्रोता चेतना) हैं जो साधक के अंतःकरण की सबसे सूक्ष्म प्रार्थना को भी सुनते हैं।

नित्य प्रार्थना, अग्निहोत्र एवं अभीष्ट-सिद्धि अनुष्ठान ((Rg. 8-60-16)) में भक्ति-स्वीकृति हेतु प्रयुक्त।

Mantra 51

Devata: Agni · Rishi: Saubahri Kanva

प्र दैवो॑दासो अ॒ग्निर्दे॒वाँ अच्छा॒ न म॒ज्मना॑ | अनु॑ मा॒तरं॑ पृथि॒वीं वि वा॑वृते त॒स्थौ नाक॑स्य॒ सान॑वि ||

ऋषि भरद्वाज यहाँ 'दक्ष' (सामर्थ्य, सतर्कता व अमोघ कार्य-कुशलता) की याचना करते हैं और तमस (आलस्य व प्रमाद) के नाश की प्रार्थना करते हैं। योग-सूत्रों में आलस्य और प्रमाद को चित्त की मुख्य बाधाएँ (अंतरिक्ष) माना गया है। अग्नि को 'दक्षपति' के रूप में जपाने से साधक में तमस का नाश होकर तीव्र अभ्यासाग्नि प्रदीप्त होती है।

प्रातः अग्निहोत्र एवं स्वाध्याय आरंभ ((Rg. 6-16-17)) में आलस्य-निवारण व कार्य-दक्षता हेतु जपनीय।

Mantra 52

Devata: Indra · Rishi: Medhatithi and medhyathithi

अध॒ ज्मो अध॑ वा दि॒वो बृ॑ह॒तो रो॑च॒नादधि॑ | अ॒या व॑र्धस्व त॒न्वा॑ गि॒रा ममा ऽऽजा॒ता सु॑क्रतो पृण ||

अग्नि की स्तुति 'धिवसु' (जिनका वास्तविक धन आत्म-ज्ञान व विशुद्ध बुद्धि है) के रूप में की गई है। 'धी' का अर्थ है ऋतंभरा बुद्धि और 'वसु' का अर्थ है दैवी संपद्। वेदान्त के अनुसार, सच्चा धन सांसारिक वस्तुएँ नहीं, बल्कि वह प्रकाशित प्रज्ञा (धी) है जो सत्य और असत्य का सम्यक् विवेक करती है।

गायत्री उपासना तथा मेधा-जनन विधान ((Rg. 8-60-11)) में सात्विक बुद्धि व प्रज्ञा-धन की प्राप्ति हेतु प्रयुक्त।

Mantra 53

Devata: Agni · Rishi: Vishvamitra Gathina

काय॑मानो व॒ना त्वं यन्मा॒तॄरज॑गन्न॒पः | न तत् ते॑ अग्ने प्र॒मृषे॑ नि॒वर्त॑नं॒ यद् दू॒रे सन्नि॒हाभ॑वः ||

अग्नि का स्तवन 'सत्यधर्मा' (सत्य ही जिनका शाश्वत धर्म है) और 'ऋतचित्' के रूप में किया गया है। 'ऋत' ब्रह्मांडीय प्राकृतिक नियम है और 'सत्य' मन-वाणी-कर्म में उसका प्रकटीकरण है। तैत्तिरीयोपनिषद् का आदेश है: 'सत्यं वद, धर्मं चर'। वेदान्त के अनुसार, सत्य-धर्म में स्थित होने से साधक का मन सीधे परम ब्रह्म से जुड़ जाता है।

सत्य-व्रत अनुष्ठान एवं नित्य स्वाध्याय ((Rg. 1-12-7)) में धर्म-निष्ठा और सत्य-आचरण हेतु प्रयुक्त।

Mantra 54

Devata: Agni · Rishi: Ghaura Kanva

नि त्वाम॑ग्ने॒ मनु॑र्दधे॒ ज्योति॒र्जना॑य॒ शश्व॑ते | दी॒देथ॒ कण्व॑ ऋ॒तजा॑त उक्षि॒तो यं न॑म॒स्यन्ति॑ कृ॒ष्टय॑: ||

Ni tvam agne manur dadhe jyotirjanaya

ऋषि भरद्वाज अग्नि की स्तुति 'नावमिव-परिणीय' (नाव की भाँति भवसागर से पार कराने वाले) के रूप में करते हैं। वेदान्त में संसार को एक अपार सागर माना गया है और अग्नि 'ज्ञान-नौका' हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, ज्ञान-रूपी नौका द्वारा साधक समस्त दुःखों और अज्ञान-समुद्र को पार करके परम शांति प्राप्त करता है।

स्वस्त्ययन तथा संकट-मोचन पाठ ((Rg. 6-16-45)) में भवसागर से पार उतरने हेतु जपनीय।

Mantra 55

Devata: Agni · Rishi: Vasishtha Maitravaruni

दे॒वो वो॑ द्रविणो॒दाः पू॒र्णां वि॑वष्ट्या॒सिच॑म् | उद्वा॑ सि॒ञ्चध्व॒मुप॑ वा पृणध्व॒मादिद्वो॑ दे॒व ओ॑हते ||

अग्नि को 'शांतिपति' और 'शंयोः' (समग्र आध्यात्मिक व भौतिक कल्याण करने वाले) के रूप में पूजा गया है। वेदान्त में 'शांति' केवल चुप्पी नहीं, बल्कि चित्त की अचल समता (समत्वम्) है। जब साधक की मानसिक वृत्तियाँ शांत होकर आत्मा में लीन होती हैं, तब त्रिविध तापों (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) का नाश होकर परम शांति की प्राप्ति होती है।

शांति-पाठ तथा यज्ञ की पूर्णाहुति ((Rg. 8-60-20)) में वैश्विक शांति व चित्त-समता हेतु प्रयुक्त।

Mantra 56

Devata: Agni · Rishi: Ghora Kanva

मतं ब्रह्मणस्पततिः प्र देव्येतु प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र सूनृता | र t दे अच्छा वीरं न्यं प्धिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः ॥ ॥

ऋषि भरद्वाज अग्नि को 'वाचस्पति' (पवित्र वाणी के स्वामी) के रूप में पुकारते हैं। वैदिक दर्शन में वाणी के चार स्तर हैं—परा, पश्यंती, मध्यमा और वैखरी। वेदान्त के अनुसार, 'वाचस्पति' शब्द-ब्रह्म का स्वरूप हैं जो वाग्-इंद्रिय के विकारों को नष्ट करके मनुष्य के वचनों को कल्याणकारी मंत्र में बदल देते हैं।

वाग्-संस्कार, वेदाध्ययन आरंभ एवं संध्या वंदन ((Rg. 6-16-36)) में वाक्-सिद्धि एवं वाणी-शुद्धि हेतु जपनीय।

Mantra 57

Devata: Agni · Rishi: Ghora Kanva

ऊ॒र्ध्व ऊ॒ षु ण॑ ऊ॒तये॒ तिष्ठा॑ दे॒वो न स॑वि॒ता | ऊ॒र्ध्वो वाज॑स्य॒ सनि॑ता॒ यद॒ञ्जिभि॑र्वा॒घद्भि॑र्वि॒ह्वया॑महे ||

अग्नि का स्तवन 'दिवेदिवे दोषावस्तर् धिया वयम्' (प्रतिदिन, रात-दिन, अपनी विशुद्ध बुद्धि द्वारा हम नमन करते हैं) के रूप में किया गया है। यह 'नित्य संध्या' की वैदिक नींव है। वेदान्त में 'दोषावस्तर्' (अज्ञान-रात्रि के प्रकाशक) आत्मा का प्रतीक है जो मानसिक संकटों के अंधेरे में भी सदा देदीप्यमान रहता है।

नित्य अग्निहोत्र एवं त्रिकाल संध्यापाठ ((Rg. 1-1-7)) में अखंड आत्म-स्मरण हेतु प्रयुक्त।

Mantra 58

Devata: Agni · Rishi: Saubahri Kanva

प्र यं रा॒ये निनी॑षसि॒ मर्तो॒ यस्ते॑ वसो॒ दाश॑त् | स वी॒रं ध॑त्ते अग्न उक्थशं॒सिनं॒ त्मना॑ सहस्रपो॒षिण॑म् ||

अग्नि का स्तवन 'तिग्महेति' (सत्य के तीक्ष्ण अस्त्रों वाले) के रूप में किया गया है जो अज्ञान के असुरों का विनाश करते हैं। वेदान्त में 'तिग्महेति' भगवद्गीता के 'ज्ञान-असि' (विवेक रूपी तीक्ष्ण तलवार) का प्रतीक है। असंगता और तीक्ष्ण विवेक के अस्त्र द्वारा साधक वासनाओं की जड़ों को काटकर आत्म-स्वतंत्रता प्राप्त करता है।

रक्षोघ्न यज्ञ तथा अस्त्र-मंत्र पाठ ((Rg. 6-16-34)) में आसुरी वृत्तियों के भेदन व ज्ञान-दीप्ति हेतु जपनीय।

Mantra 59

Devata: Agni · Rishi: Ghora Kanva

प्र वो॑ य॒ह्वं पु॑रू॒णां वि॒शां दे॑वय॒तीना॑म् | अ॒ग्निं सू॒क्तेभि॒र्वचो॑भिरीमहे॒ यं सी॒मिद॒न्य ईळ॑ते ||

ऋषि भरद्वाज अग्नि को 'नेता' (परम मार्गदर्शक) और 'पारयिता' (पार लगाने वाले) के रूप में पूजते हैं। वेदान्त में जीव संसार का यात्री है। 'नेता' के रूप में अग्नि अंतःकरण की वह विवेक-ज्योति (साक्षी) हैं जो बुद्धि को अधर्म से मोड़कर मोक्ष-मार्ग पर अग्रसर करती है।

पथ्या-स्वस्त्ययन एवं यात्रा-प्रारंभ ((Rg. 6-16-43)) में सुमार्ग-दर्शन व निर्विघ्न यात्रा हेतु प्रयुक्त।

Mantra 60

Devata: Agni · Rishi: Utkeela Katya

अ॒यम॒ग्निः सु॒वीर्य॒स्येशे॑ म॒हः सौभ॑गस्य | रा॒य ई॑शे स्वप॒त्यस्य॒ गोम॑त॒ ईशे॑ वृत्र॒हथा॑नाम् ||

अग्नि की स्तुति 'सुहव' (सच्ची पुकार पर तुरंत उत्तर देने वाले) और 'विधाता' के रूप में की गई है। 'सुहव' पद यह बतलाता है कि जब साधक की मुमुक्षा निष्कपट होती है, तो परमेश्वर का अनुग्रह (कृपा) तुरंत अवतरित होता है। वेदान्त में 'विधाता' कर्मफल-दाता अंतर्यामी ईश्वर का प्रतीक है।

नित्य अग्निहोत्र एवं देव-आह्वान ((Rg. 8-60-17)) में भगवद्-अनुग्रह व प्रार्थना-स्वीकृति हेतु प्रयुक्त।

Mantra 61

Devata: Agni · Rishi: Vasishtha Maitravaruni

त्वम॑ग्ने गृ॒हप॑ति॒स्त्वं होता॑ नो अध्व॒रे | त्वं पोता॑ विश्ववार॒ प्रचे॑ता॒ यक्षि॒ वेषि॑ च॒ वार्य॑म् ||

Tvam agne grhapatis tvam hota no adhvare. Tvam pota visvavara praceta yaksi yasi ca

अग्नि का स्तवन 'गोपाः ऋतस्य' (ऋत व शाश्वत नियमों के रक्षक) और 'दीदिविः' (सदा प्रदीप्त रहने वाले) के रूप में किया गया है। 'गोपाः ऋतस्य' पद बतलाता है कि परमात्मा ब्रह्मांडीय नियमों और साधक की साधना-संपत्ति की रक्षा करते हैं। वेदान्त के अनुसार, धर्मानुकूल आचरण करने से साधक की आध्यात्मिक उन्नति कभी नष्ट नहीं होती।

अग्निहोत्र तथा नियम-धारण अनुष्ठान ((Rg. 1-1-8)) में धर्म-रक्षा एवं साधना-सिद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 62

Devata: Agni · Rishi: Vishvamitra Gathina

सखा॑यस्त्वा ववृमहे दे॒वं मर्ता॑स ऊ॒तये॑ | अ॒पां नपा॑तं सु॒भगं॑ सु॒दीदि॑तिं सु॒प्रतू॑र्तिमने॒हस॑म् ||

ऋषि भरद्वाज अग्नि का आह्वान 'संयमन' (समस्त समाज को एक सूत्र में पिरोने वाले) के रूप में करते हैं। यहाँ 'संगच्छध्वं संवदध्वम्' (साथ चलें, एक स्वर में बोलें) का संदेश है। वेदान्त में अग्नि 'सूत्रात्मा' (सबको जोड़ने वाली चेतना) हैं। जब मनुष्य यह समझता है कि एक ही आत्मा सबमें विराजमान है, तो सामाजिक द्वेष और असमानता समाप्त हो जाती है।

समनस्य सूक्त पाठ तथा संगठन याग ((Rg. 6-16-32)) में सामाजिक एकता व शांति हेतु जपनीय।

Mantra 63

Devata: Agni · Rishi: Shyavashva or Vamadeva Gautama

आ जुहोता हविषा मर्जयध्वं नि होतारं गृहपतिं दधिध्वम्‌ । = र इडस्पदे नमसा रातहव्यं सपर्यता यजतं पस्त्यानाम्‌ ॥ ॥

A juhota havisa marjayadhvam ni hotaram grhapatim dadhidhvam. Idaspade namasa

अग्नि की स्तुति 'स्कंभ' (आकाश और पृथ्वी को धारण करने वाले ब्रह्मांडीय स्तंभ) के रूप में की गई है। अथर्ववेद के स्कंभ सूक्त में 'स्कंभ' संपूर्ण ब्रह्मांड को धारण करने वाले ब्रह्म का प्रतीक है। वेदान्त के अनुसार, जो साधक इस 'स्कंभ-ब्रह्म' में निष्ठा रखता है, वह संसार के उतार-चढ़ाव में भी पर्वत की भाँति अचल और धीर बना रहता है।

स्कंभ-उपासना एवं यूप-प्रतिष्ठा विधान ((Rg. 8-60-5)) में आध्यात्मिक स्थिरता व ब्रह्म-निष्ठा हेतु प्रयुक्त।

Mantra 64

Devata: Agni · Rishi: Upastuta Varshtihavya

चि॒त्र इच्छिशो॒स्तरु॑णस्य व॒क्षथो॒ न यो मा॒तरा॑व॒प्येति॒ धात॑वे | अ॒नू॒धा यदि॒ जीज॑न॒दधा॑ च॒ नु व॒वक्ष॑ स॒द्यो महि॑ दू॒त्यं१ चर॑न् ||

ऋषि भरद्वाज अग्नि का स्तवन 'शोक-नाशन' (समस्त दुःखों का अंत करने वाले) के रूप में करते हैं। 'शोक' का मूल कारण अज्ञान और अनित्य वस्तुओं से आसक्ति (मोह) है। वेदान्त में, 'ज्ञान-अग्नि' अविद्या को भस्म करके साधक को उसके निज 'आनंद-स्वरूप' का साक्षात्कार कराती है। उपनिषदों का वचन है: 'तरति शोकम् आत्मवित्' (आत्मज्ञानी समस्त दुःखों से पार उतर जाता है)।

शांति-पाठ तथा संताप-निवारण विधान ((Rg. 6-16-31)) में मानसिक-शांति व आनंद-प्राप्ति हेतु जपनीय।

Mantra 65

Devata: Agni · Rishi: Brhaduktha

इ॒दं त॒ एकं॑ प॒र ऊ॑ त॒ एकं॑ तृ॒तीये॑न॒ ज्योति॑षा॒ सं वि॑शस्व | सं॒वेश॑ने त॒न्व१श्चारु॑रेधि प्रि॒यो दे॒वानां॑ पर॒मे ज॒नित्रे॑ ||

अग्नि को 'मधुमान्' (दिव्य आनंद-रस से परिपूर्ण) और 'रसपति' कहा गया है। वैदिक प्रतीकात्मकता में 'मधु' बृहदारण्यकोपनिषद् की 'मधु-विद्या' (समस्त ब्रह्मांड में विद्यमान आत्मिक मिठास) का सूचक है। वेदान्त के अनुसार, इस मंत्र का ध्यान साधक को यह अनुभूति कराता है कि संपूर्ण विश्व अद्वैत ब्रह्म के आनंद-रस से ओत-प्रोत है।

मधुपर्क संस्कार, सोमयाग एवं मधु-विद्या स्वाध्याय ((Rg. 8-60-6)) में सर्वत्र आत्मिक मिठास के ध्यान हेतु प्रयुक्त।

Mantra 66

Devata: Agni · Rishi: Angirasa Kutsa

इ॒मं स्तोम॒मर्ह॑ते जा॒तवे॑दसे॒ रथ॑मिव॒ सं म॑हेमा मनी॒षया॑ | भ॒द्रा हि न॒: प्रम॑तिरस्य सं॒सद्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ||

अग्नि का स्तमन 'जागृवि' (सदा जाग्रत रहने वाले नित्य साक्षी) और 'ऋतगोपा' के रूप में किया गया है। वेदान्त में 'जागृवि' साक्षी-चेतना का प्रतीक है जो देह और मन के सुषुप्ति (गहरी नींद) में जाने पर भी सदा जाग्रत रहती है। इस नित्य-जाग्रत साक्षी आत्मा का साक्षात्कार करने से साधक देहाध्यास और मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है।

नित्य अग्निहोत्र एवं सायं संध्या ((Rg. 8-60-13)) में नित्य-साक्षी चेतना के ध्यान हेतु जपनीय।

Mantra 67

Devata: Vaishvanara Agni · Rishi: Bharadvaja Barhaspatya

मू॒र्धानं॑ दि॒वो अ॑र॒तिं पृ॑थि॒व्या वै॑श्वान॒रमृ॒त आ जा॒तम॒ग्निम् | क॒विं स॒म्राज॒मति॑थिं॒ जना॑नामा॒सन्ना पात्रं॑ जनयन्त दे॒वाः ||

ऋषि भरद्वाज अग्नि की स्तुति 'यज्ञवाहक' और 'मुद्दाता' (आनंददाता) के रूप में करते हैं। यह मंत्र 'कर्म' के 'यज्ञ' में रूपांतरण का रहस्य प्रकट करता है। जब कर्म अहंकारपूर्वक किया जाता है तो बंधन बनता है; किंतु जब वही कर्म 'ब्रह्मार्पणम्' भाव से किया जाता है तो वह मोक्ष और आत्मिक आनंद में बदल जाता है।

कर्म-समर्पण तथा नित्य स्वाध्याय ((Rg. 6-16-44)) में समस्त कार्यों को ईश्वर-पूजा बनाने हेतु प्रयुक्त।

Mantra 68

Devata: Agni · Rishi: Bharadvaja Barhaspatya

वि त्वदापो॒ न पर्व॑तस्य पृ॒ष्ठादु॒क्थेभि॑रिन्द्रानयन्त य॒ज्ञैः | तं त्वा॒भिः सु॑ष्टु॒तिभि॑र्वा॒जय॑न्त आ॒जिं न ज॑ग्मुर्गिर्वाहो॒ अश्वा॑: ||

अग्नि को 'वनपति' (वनस्पतियों व प्रकृति के स्वामी) और समस्त जीवों के संरक्षक के रूप में पूजने का विधान है। वैदिक दृष्टि में प्रकृति जड़ नहीं, बल्कि ईश्वर का साक्षात चेतन स्वरूप है। ईशावास्योपनिषद् के अनुसार 'ईशा वास्यमिदं सर्वम्'—वृक्षों, नदियों और समूची प्रकृति में परमेश्वर का वास मानकर उनका संवर्धन करना ही सच्चा धर्म है।

वृक्षारोपण, अरण्य-सूक्त पाठ एवं प्रकृति-पूजन ((Rg. 8-60-18)) में पर्यावरण-संरक्षण व चेतना-संवर्धन हेतु प्रयुक्त।

Mantra 69

Devata: Agni · Rishi: Vamadeva Gautama

आ वो॒ राजा॑नमध्व॒रस्य॑ रु॒द्रं होता॑रं सत्य॒यजं॒ रोद॑स्योः | अ॒ग्निं पु॒रा त॑नयि॒त्नोर॒चित्ता॒द्धिर॑ण्यरूप॒मव॑से कृणुध्वम् ||

A vo rajanam adhvarasva rudram hotaram

अग्नि का आह्वान 'रयिपति' (ऐश्वर्य के स्वामी) और 'रत्नधातमम्' (श्रेष्ठ रत्नों को धारण कराने वाले) के रूप में किया गया है। प्रश्नोपनिषद् में 'रयि' सूक्ष्म प्राणात्मक ऊर्जा है और 'रत्न' भगवद्गीता के 'दैवी संपद्' (अभय, सत्त्व-संशुद्धि, दान व दम) का प्रतीक हैं। वेदान्त के अनुसार, रयिपति वह आत्म-धन (ज्ञान) प्रदान करते हैं जो अजर-अमर है।

लक्ष्मी-अग्निहोत्र तथा नित्य पाठ ((Rg. 1-1-1)) में दैवी संपत्ति व आत्म-ज्ञान रूपी धन की प्राप्ति हेतु जपनीय।

Mantra 70

Devata: Agni · Rishi: Vasishtha Maitravaruni

इ॒न्धे राजा॒ सम॒र्यो नमो॑भि॒र्यस्य॒ प्रती॑क॒माहु॑तं घृ॒तेन॑ | नरो॑ ह॒व्येभि॑रीळते स॒बाध॒ आग्निरग्र॑ उ॒षसा॑मशोचि ||

ऋषि भरद्वाज अग्नि को 'परस्तात्-ज्योतिः' (देश-काल और प्रकृति से परे सर्वोच्च परम ज्योति) के रूप में पूजते हैं। 'परस्तात्' वेदान्त में 'तुरीय' (तीनों अवस्थाओं से परे चतुर्थ चेतन पद) का सूचक है। बृहदारण्यकोपनिषद् में ब्रह्म को 'ज्योतिषां ज्योतिः' (प्रकाशों का भी प्रकाश) कहा गया है, जो बिना किसी बाह्य साधन के स्वयं प्रकाशित रहता है।

ज्योतिष्टोम याग तथा ब्रह्मयज्ञ स्वाध्याय ((Rg. 6-16-46)) में तुरीय चेतना व परम ज्योति के ध्यान हेतु प्रयुक्त।

Mantra 71

Devata: Agni · Rishi: Trishiras Tvashtra

प्र के॒तुना॑ बृह॒ता या॑त्य॒ग्निरा रोद॑सी वृष॒भो रो॑रवीति | दि॒वश्चि॒दन्ताँ॑ उप॒माँ उदा॑नळ॒पामु॒पस्थे॑ महि॒षो व॑वर्ध ||

अग्नि की स्तुति 'मित्रपति' (दिव्य मैत्री के अधिपति) के रूप में की गई है। वैदिक दर्शन में 'मित्र' सौहार्द, करुणा और अद्वैत मैत्री का प्रतीक है। वेदान्त के अनुसार, जब साधक संपूर्ण प्राणियों में अपने ही आत्म-स्वरूप को देखता है (आत्मवत् सर्वभूतेषु), तब उसके हृदय में समष्टि मैत्री का अनायास स्फुरण होता है।

मित्र-वरुण याग तथा मैत्री-उपासना ((Rg. 8-60-3)) में सामाजिक सौहार्द व करुणा-वृद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 72

Devata: Agni · Rishi: Vasishtha Maitravaruni

fy सयं तचल र अगिं नरो दीधिति जनयत प्रशास्तम्‌। दूरेदुशं गृहपतिमथव्युम्‌ ॥ ॥

ऋषि भरद्वाज अग्नि को 'पुरोहित' (आत्मा के आगे चलने वाले मुख्य मार्गदर्शक) और 'यज्ञस्य देव-ऋत्विज' के रूप में स्तुत करते हैं। 'पुरोहित' का अर्थ है जिसे कल्याण के लिए आगे रखा गया हो। वेदान्त में, पुरोहित साधक की विशुद्ध बुद्धि अथवा 'अंतद्-गुरु' का प्रतीक है जो हर कर्म से पूर्व सत्य का मार्ग प्रशस्त करती है।

पुरोहित-वरण एवं नित्य अग्निहोत्र ((Rg. 1-1-1)) में आध्यात्मिक मार्गदर्शन व प्रज्ञा-दीप्ति हेतु प्रयुक्त।

Mantra 73

Devata: Agni · Rishi: Budha-Gavishthirau of Atreyau

अबो॑ध्य॒ग्निः स॒मिधा॒ जना॑नां॒ प्रति॑ धे॒नुमि॑वाय॒तीमु॒षास॑म् | य॒ह्वा इ॑व॒ प्र व॒यामु॒ज्जिहा॑ना॒: प्र भा॒नव॑: सिस्रते॒ नाक॒मच्छ॑ ||

अग्नि का आह्वान 'दुर्मति-हन्' (विपरीत व कुत्सित सोच के विनाशक) और 'सुमति-दाता' (सात्विक बुद्धि देने वाले) के रूप में किया गया है। वेदान्त में 'दुर्मति' अज्ञान-जनित भ्रांत धारणाओं का प्रतीक है। विवेक-अग्नि कुत्सित विचारों का दमन करके साधक को 'सुमति' (सत्य-ग्राहिणी सात्विक बुद्धि) प्रदान करती है।

अग्निहोत्र तथा मानसिक-शुद्धि अनुष्ठान ((Rg. 6-16-37)) में कुविचार-निवारण व सात्विक सोच हेतु जपनीय।

Mantra 74

Devata: Agni · Rishi: Vatsapri Bhalandana

प्र भू॒र्जय॑न्तं म॒हां वि॑पो॒धां मू॒रा अमू॑रं पु॒रां द॒र्माण॑म् | नय॑न्तो॒ गर्भं॑ व॒नां धियं॑ धु॒र्हिरि॑श्मश्रुं॒ नार्वा॑णं॒ धन॑र्चम् ||

अग्नि को 'गर्भः ओषधीनाम्' (ओषधियों का अंतर्निहित चैतन्य) और 'गर्भः वनस्पतीनाम्' (वृक्षों की जीवन-शक्ति) के रूप में पूजा गया है। यह वैदिक अध्यात्म के पर्यावरण-दर्शन का मुख्य आधार है। वेदान्त के अनुसार, अग्नि यहाँ प्रकृति के भीतर अंतर्यामी रूप से विद्यमान 'प्राण-स्पंदन' हैं जो सिद्ध करते हैं कि सृष्टि का कण-कण ब्रह्म से अनुप्राणित है।

ओषधि-सूक्त पाठ, वनस्पति-पूजन एवं यज्ञ विधान ((Rg. 3-27-12)) में प्राकृतिक चेतना के संवर्धन हेतु प्रयुक्त।

Mantra 75

Devata: Pusha · Rishi: Bharadvaja Barhaspatya

शु॒क्रं ते॑ अ॒न्यद्य॑ज॒तं ते॑ अ॒न्यद्विषु॑रूपे॒ अह॑नी॒ द्यौरि॑वासि | विश्वा॒ हि मा॒या अव॑सि स्वधावो भ॒द्रा ते॑ पूषन्नि॒ह रा॒तिर॑स्तु ||

Sukram te anyad yajatam te anyad visurupe ahani dyaur ivasi. Visva hi maya avasi

ऋषि भरद्वाज अग्नि से 'अहश्च रात्रिश्च' (दिन और रात्रि के समस्त संधिकालों में) सुरक्षा की याचना करते हैं। काल (समय) निरंतर परिवर्तन और भौतिक क्षय लाता है। वेदान्त के अनुसार, अग्नि काल से परे कालातीत ब्रह्म का प्रतीक हैं जो साधक के आध्यात्मिक स्वरूप की रक्षा करते हुए उसे परम अभय प्रदान करते हैं।

रात्रि-सूक्त पाठ, त्रिकाल संध्या एवं अग्निहोत्र ((Rg. 6-16-35)) में कालिक विघ्नों से सुरक्षा हेतु जपनीय।

Mantra 76

Devata: Agni · Rishi: Vishvamitra Gathina

इळा॑मग्ने पुरु॒दंसं॑ स॒निं गोः श॑श्वत्त॒मं हव॑मानाय साध | स्यान्न॑: सू॒नुस्तन॑यो वि॒जावा ऽग्ने॒ सा ते॑ सुम॒तिर्भू॑त्व॒स्मे ||

Idam agne purudamsam sanim goh Sasva-

अग्नि को 'ऊर्जस्पति' (प्राण-शक्ति व आत्मिक ऊर्जा के स्वामी) और 'सहसः पुत्र' के रूप में स्तुत किया गया है। 'ऊर्ज' का अर्थ है विशुद्ध ओजस्वी प्राण। केनोपनिषद् के अनुसार, ब्रह्म 'प्राणस्य प्राणः' (प्राणों का भी प्राण) हैं जो पंच-कोषों को स्पंदित करते हैं। इस मंत्र का ध्यान साधक के भीतर अनंत प्राण-शक्ति का संचार करता है।

प्राणायाम साधना, नित्य अग्निहोत्र एवं वाजपेय याग ((Rg. 8-60-7)) में ओज-वृद्धि व प्राण-पुष्टि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 77

Devata: Agni · Rishi: Vatsapri Bhalandana

प्र होता॑ जा॒तो म॒हान्न॑भो॒विन्नृ॒षद्वा॑ सीदद॒पामु॒पस्थे॑ | दधि॒र्यो धायि॒ स ते॒ वयां॑सि य॒न्ता वसू॑नि विध॒ते त॑नू॒पाः ||

Pra hota jato mahan nabhovin nrsadma

अग्नि का स्तवन 'पावकशोचिः' (पावन करने वाली ज्वाला वाले) और 'शुक्रभ्राजाः' के रूप में किया गया है। 'पावक' उस ज्ञान-अग्नि का सूचक है जो अंतःकरण के काम-क्रोध रूपी विकारों को भस्म कर देती है। वेदान्त के अनुसार, इस पावक ज्वाला का ध्यान मनोमय कोष के संचित मल को जलाकर सात्विक निर्मलता प्रदान करता है।

पावमान सूक्त पाठ तथा अग्निहोत्र ((Rg. 3-27-4)) में अंतःकरण-शुद्धि एवं चित्त-प्रसाद हेतु जपनीय।

Mantra 78

Devata: Vaishvanara Agni · Rishi: Vasishtha Maitravaruni

प्र स॒म्राजो॒ असु॑रस्य॒ प्रश॑स्तिं पुं॒सः कृ॑ष्टी॒नाम॑नु॒माद्य॑स्य | इन्द्र॑स्येव॒ प्र त॒वस॑स्कृ॒तानि॒ वन्दे॑ दा॒रुं वन्द॑मानो विवक्मि ||

अग्नि को 'कविः' (अतीन्द्रिय सत्य के क्रांतदर्शी द्रष्टा) और 'प्रत्नः' (सनातन) के रूप में पूजा गया है। वैदिक प्रज्ञा में 'कवि' वह है जो देश-काल के परे नित्य सत्य का साक्षात्कार करता है। वेदान्त के अनुसार, 'कवि' प्रज्ञान-ब्रह्म का प्रतीक है जो संपूर्ण सृष्टि को अपनी शाश्वत प्रज्ञा से अनुप्राणित करता है।

स्वाध्याय आरंभ एवं मेधा-जनन संस्कार ((Rg. 8-60-3)) में क्रांतदर्शी प्रज्ञा की प्राप्ति हेतु प्रयुक्त।

Mantra 79

Devata: Agni · Rishi: Vishvamitra Gathina

न्वसिता द ग्भिंणीधि जातवेदा सुभृतो गर्भिंणीभिः। जागवद्धिर्दविष्मद्धिर्मनुष्यैभिरग्नि र्‌ रेक दिवेदिव : ॥ ॥

ऋषि भरद्वाज अग्नि को 'द्युभक्त' (दिव्य द्युलोक से जुड़े) और 'दिव्य-दूत' के रूप में वर्णित करते हैं। यह ऋचा चेतना के 'भूः' (भौतिक) से 'द्युः' (परम चिन्मय) सोपान पर आरोहण को दर्शाती है। वेदान्त में अग्नि 'देवयान-मार्ग' (प्रकाश का पथ) हैं जो साधक की चेतना को संकीर्णता से उठाकर परम पद तक पहुँचाते हैं।

अग्न्याधान तथा देवयान-मार्ग ध्यान ((Rg. 6-16-47)) में उच्च चेतना-सोपान पर आरोहण हेतु प्रयुक्त।

Mantra 80

Devata: Agni Rakshoha · Rishi: Payu Bharadvaja

स॒नाद॑ग्ने मृणसि यातु॒धाना॒न्न त्वा॒ रक्षां॑सि॒ पृत॑नासु जिग्युः | अनु॑ दह स॒हमू॑रान्क्र॒व्यादो॒ मा ते॑ हे॒त्या मु॑क्षत॒ दैव्या॑याः ||

Sanad agne mrnasi yatudhanan na tva raksamsi

अग्नि का स्तवन 'व्रतपाः' (पवित्र संकल्पों के रक्षक) और 'सत्यस्य गोपाः' के रूप में किया गया है। 'व्रत' (सत्य व संयम का नियम) साधना की रीढ़ की हड्डी है। वेदान्त के अनुसार, जो साधक सत्य पर दृढ रहता है (सत्य-निष्ठा), परमात्मा स्वयं उसकी साधना की रक्षा करते हैं और अंततः उसे 'सत्यमेव जयते' का फल प्रदान करते हैं।

व्रत-धारण, संस्कार अनुष्ठान एवं संध्या पाठ ((Rg. 8-60-4)) में सत्य-निष्ठा व व्रत-रक्षा हेतु जपनीय।

Mantra 81

Devata: Agni · Rishi: Gaya Atreya

अग्न॒ ओजि॑ष्ठ॒मा भ॑र द्यु॒म्नम॒स्मभ्य॑मध्रिगो | प्र नो॑ रा॒या परी॑णसा॒ रत्सि॒ वाजा॑य॒ पन्था॑म् ||

Agna ojisthama bhara dyumnamasmabhyam

वैदिक अध्यात्म में, ऋषि Gaya Atreya ((Rg. 5-10-1)) Agni की वंदना बुद्धि-प्रकाशक चेतना के रूप में करते हैं। यह मंत्र दर्शाता है कि कैसे दिव्य प्रकाश संसारिक दृष्टियों को आध्यात्मिक विवेक में रूपांतरित करता है। दार्शनिक रूप से, यह साधक को निरंतर मनन और विवेक द्वारा आत्म-स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा देता है।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय एवं यज्ञ अनुष्ठान ((Rg. 5-10-1)) में Agni की कृपा तथा चित्त-शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 82

Devata: Agni · Rishi: Vamadeva

चा ड र यदि अनु ष्यादगरिमिन्धीत । आजुह्छन्दव्यमानुषक्‌ शर्म भक्षीत दैव्यम्‌॥ ॥

वैदिक अध्यात्म में, ऋषि Vamadeva () Agni की वंदना बुद्धि-प्रकाशक चेतना के रूप में करते हैं। यह मंत्र दर्शाता है कि कैसे दिव्य प्रकाश संसारिक दृष्टियों को आध्यात्मिक विवेक में रूपांतरित करता है। दार्शनिक रूप से, यह साधक को निरंतर मनन और विवेक द्वारा आत्म-स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा देता है।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय एवं यज्ञ अनुष्ठान () में Agni की कृपा तथा चित्त-शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 83

Devata: Agni · Rishi: Bharadvaja Barhaspatya

त्वे॒षस्ते॑ धू॒म ऋ॑ण्वति दि॒वि षञ्छु॒क्र आत॑तः | सूरो॒ न हि द्यु॒ता त्वं कृ॒पा पा॑वक॒ रोच॑से ||

वैदिक अध्यात्म में, ऋषि Bharadvaja Barhaspatya ((Rg. 6-2-6)) Agni की वंदना बुद्धि-प्रकाशक चेतना के रूप में करते हैं। यह मंत्र दर्शाता है कि कैसे दिव्य प्रकाश संसारिक दृष्टियों को आध्यात्मिक विवेक में रूपांतरित करता है। दार्शनिक रूप से, यह साधक को निरंतर मनन और विवेक द्वारा आत्म-स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा देता है।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय एवं यज्ञ अनुष्ठान ((Rg. 6-2-6)) में Agni की कृपा तथा चित्त-शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 84

Devata: Agni · Rishi: Bharadvaja Barhaspatya

त्वं हि क्षैत॑व॒द् यशो ऽग्ने॑ मि॒त्रो न पत्य॑से | त्वं वि॑चर्षणे॒ श्रवो॒ वसो॑ पु॒ष्टिं न पु॑ष्यसि ||

वैदिक अध्यात्म में, ऋषि Bharadvaja Barhaspatya ((Rg. 6-2-1)) Agni की वंदना बुद्धि-प्रकाशक चेतना के रूप में करते हैं। यह मंत्र दर्शाता है कि कैसे दिव्य प्रकाश संसारिक दृष्टियों को आध्यात्मिक विवेक में रूपांतरित करता है। दार्शनिक रूप से, यह साधक को निरंतर मनन और विवेक द्वारा आत्म-स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा देता है।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय एवं यज्ञ अनुष्ठान ((Rg. 6-2-1)) में Agni की कृपा तथा चित्त-शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 85

Devata: Agni · Rishi: Dvita Mrktavaha Atreya

प्रा॒तर॒ग्निः पु॑रुप्रि॒यो वि॒शः स्त॑वे॒ताति॑थिः | विश्वा॑नि॒ यो अम॑र्त्यो ह॒व्या मर्ते॑षु॒ रण्य॑ति ||

वैदिक अध्यात्म में, ऋषि Dvita Mrktavaha Atreya ((Rg. 5-18-1)) Agni की वंदना बुद्धि-प्रकाशक चेतना के रूप में करते हैं। यह मंत्र दर्शाता है कि कैसे दिव्य प्रकाश संसारिक दृष्टियों को आध्यात्मिक विवेक में रूपांतरित करता है। दार्शनिक रूप से, यह साधक को निरंतर मनन और विवेक द्वारा आत्म-स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा देता है।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय एवं यज्ञ अनुष्ठान ((Rg. 5-18-1)) में Agni की कृपा तथा चित्त-शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 86

Devata: Agni · Rishi: Vasuyavah Atreya

यद् वाहि॑ष्ठं॒ तद॒ग्नये॑ बृ॒हद॑र्च विभावसो | महि॑षीव॒ त्वद् र॒यिस्त्वद् वाजा॒ उदी॑रते ||

वैदिक अध्यात्म में, ऋषि Vasuyavah Atreya ((Rg. 5-25-7)) Agni की वंदना बुद्धि-प्रकाशक चेतना के रूप में करते हैं। यह मंत्र दर्शाता है कि कैसे दिव्य प्रकाश संसारिक दृष्टियों को आध्यात्मिक विवेक में रूपांतरित करता है। दार्शनिक रूप से, यह साधक को निरंतर मनन और विवेक द्वारा आत्म-स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा देता है।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय एवं यज्ञ अनुष्ठान ((Rg. 5-25-7)) में Agni की कृपा तथा चित्त-शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 87

Devata: Agni · Rishi: Gopavana Atreya

वि॒शोवि॑शो वो॒ अति॑थिं वाज॒यन्त॑: पुरुप्रि॒यम् | अ॒ग्निं वो॒ दुर्यं॒ वच॑: स्तु॒षे शू॒षस्य॒ मन्म॑भिः ||

वैदिक अध्यात्म में, ऋषि Gopavana Atreya ((Rg. 8-74-1)) Agni की वंदना बुद्धि-प्रकाशक चेतना के रूप में करते हैं। यह मंत्र दर्शाता है कि कैसे दिव्य प्रकाश संसारिक दृष्टियों को आध्यात्मिक विवेक में रूपांतरित करता है। दार्शनिक रूप से, यह साधक को निरंतर मनन और विवेक द्वारा आत्म-स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा देता है।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय एवं यज्ञ अनुष्ठान ((Rg. 8-74-1)) में Agni की कृपा तथा चित्त-शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 88

Devata: Agni · Rishi: Puru Atreya

बृ॒हद् वयो॒ हि भा॒नवेऽर्चा॑ दे॒वाया॒ग्नये॑ | यं मि॒त्रं न प्रश॑स्तिभि॒र्मर्ता॑सो दधि॒रे पु॒रः ||

वैदिक अध्यात्म में, ऋषि Puru Atreya ((Rg. 5-16-1)) Agni की वंदना बुद्धि-प्रकाशक चेतना के रूप में करते हैं। यह मंत्र दर्शाता है कि कैसे दिव्य प्रकाश संसारिक दृष्टियों को आध्यात्मिक विवेक में रूपांतरित करता है। दार्शनिक रूप से, यह साधक को निरंतर मनन और विवेक द्वारा आत्म-स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा देता है।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय एवं यज्ञ अनुष्ठान ((Rg. 5-16-1)) में Agni की कृपा तथा चित्त-शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 89

Devata: Agni · Rishi: Gopavana Atreya

आग॑न्म वृत्र॒हन्त॑मं॒ ज्येष्ठ॑म॒ग्निमान॑वम् | यस्य॑ श्रु॒तर्वा॑ बृ॒हन्ना॒र्क्षो अनी॑क॒ एध॑ते ||

वैदिक अध्यात्म में, ऋषि Gopavana Atreya ((Rg. 8-74-4)) Agni की वंदना बुद्धि-प्रकाशक चेतना के रूप में करते हैं। यह मंत्र दर्शाता है कि कैसे दिव्य प्रकाश संसारिक दृष्टियों को आध्यात्मिक विवेक में रूपांतरित करता है। दार्शनिक रूप से, यह साधक को निरंतर मनन और विवेक द्वारा आत्म-स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा देता है।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय एवं यज्ञ अनुष्ठान ((Rg. 8-74-4)) में Agni की कृपा तथा चित्त-शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 90

Devata: Agni · Rishi: Vamadeva Kashyapo va Maruchah

दे जातः परेण ध यत्‌ सवृद्धिः सहाभुवः। द र्‌ पिता यत्कश्यपस्यागिः श्रद्धा माता मनुः कविः॥ ९०॥

वैदिक अध्यात्म में, ऋषि Vamadeva Kashyapo va Maruchah () Agni की वंदना बुद्धि-प्रकाशक चेतना के रूप में करते हैं। यह मंत्र दर्शाता है कि कैसे दिव्य प्रकाश संसारिक दृष्टियों को आध्यात्मिक विवेक में रूपांतरित करता है। दार्शनिक रूप से, यह साधक को निरंतर मनन और विवेक द्वारा आत्म-स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा देता है।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय एवं यज्ञ अनुष्ठान () में Agni की कृपा तथा चित्त-शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 91

Devata: Vishvedeva · Rishi: Agni Tapasa

सोमं॒ राजा॑न॒मव॑से॒ऽग्निं गी॒र्भिर्ह॑वामहे | आ॒दि॒त्यान्विष्णुं॒ सूर्यं॑ ब्र॒ह्माणं॑ च॒ बृह॒स्पति॑म् ||

Somam rajanam varunam agnim anvarabha-

वैदिक अध्यात्म में, ऋषि Agni Tapasa ((Rg. 10- 141-3)) Vishvedeva की वंदना बुद्धि-प्रकाशक चेतना के रूप में करते हैं। यह मंत्र दर्शाता है कि कैसे दिव्य प्रकाश संसारिक दृष्टियों को आध्यात्मिक विवेक में रूपांतरित करता है। दार्शनिक रूप से, यह साधक को निरंतर मनन और विवेक द्वारा आत्म-स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा देता है।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय एवं यज्ञ अनुष्ठान ((Rg. 10- 141-3)) में Vishvedeva की कृपा तथा चित्त-शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 92

Devata: Angirah · Rishi: Vamadeva

इत एत दिवः पृष्ठान्या रुहन्‌। प्र भूर्जयो यथा पथोद्‌ ययुः ॥ ९२॥

वैदिक अध्यात्म में, ऋषि Vamadeva () Angirah की वंदना बुद्धि-प्रकाशक चेतना के रूप में करते हैं। यह मंत्र दर्शाता है कि कैसे दिव्य प्रकाश संसारिक दृष्टियों को आध्यात्मिक विवेक में रूपांतरित करता है। दार्शनिक रूप से, यह साधक को निरंतर मनन और विवेक द्वारा आत्म-स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा देता है।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय एवं यज्ञ अनुष्ठान () में Angirah की कृपा तथा चित्त-शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 93

Devata: Agni · Rishi: Vamadeva Kashyapa Asito Devalova

र्‌ द राये अग्रे महे त्वा दानाय समिधीमदहि। हि महै दषं हतर ईडिष्वा हि महे वृषं द्यावा होत्राय पृथिवी ॥ ॥

Raye agne mahe tva danaya samidhimahi.

वैदिक अध्यात्म में, ऋषि Vamadeva Kashyapa Asito Devalova () Agni की वंदना बुद्धि-प्रकाशक चेतना के रूप में करते हैं। यह मंत्र दर्शाता है कि कैसे दिव्य प्रकाश संसारिक दृष्टियों को आध्यात्मिक विवेक में रूपांतरित करता है। दार्शनिक रूप से, यह साधक को निरंतर मनन और विवेक द्वारा आत्म-स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा देता है।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय एवं यज्ञ अनुष्ठान () में Agni की कृपा तथा चित्त-शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 94

Devata: Agni · Rishi: Somahuti Bhargava

द॒ध॒न्वे वा॒ यदी॒मनु॒ वोच॒द् ब्रह्मा॑णि॒ वेरु॒ तत् | परि॒ विश्वा॑नि॒ काव्या॑ ने॒मिश्च॒क्रमि॑वाभवत् ||

वैदिक अध्यात्म में, ऋषि Somahuti Bhargava ((Rg. 2-5-3)) Agni की वंदना बुद्धि-प्रकाशक चेतना के रूप में करते हैं। यह मंत्र दर्शाता है कि कैसे दिव्य प्रकाश संसारिक दृष्टियों को आध्यात्मिक विवेक में रूपांतरित करता है। दार्शनिक रूप से, यह साधक को निरंतर मनन और विवेक द्वारा आत्म-स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा देता है।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय एवं यज्ञ अनुष्ठान ((Rg. 2-5-3)) में Agni की कृपा तथा चित्त-शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 95

Devata: Agni Rakshoha · Rishi: Bharadvaja Payu

प्रत्य॑ग्ने॒ हर॑सा॒ हर॑: शृणी॒हि वि॒श्वत॒: प्रति॑ | या॒तु॒धान॑स्य र॒क्षसो॒ बलं॒ वि रु॑ज वी॒र्य॑म् ||

Pratyagne harasa harah srnahi visvatas pari.

वैदिक अध्यात्म में, ऋषि Bharadvaja Payu ((Rg. 10-87-25)) Agni Rakshoha की वंदना बुद्धि-प्रकाशक चेतना के रूप में करते हैं। यह मंत्र दर्शाता है कि कैसे दिव्य प्रकाश संसारिक दृष्टियों को आध्यात्मिक विवेक में रूपांतरित करता है। दार्शनिक रूप से, यह साधक को निरंतर मनन और विवेक द्वारा आत्म-स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा देता है।

पूर्वार्चिक स्वाध्याय एवं यज्ञ अनुष्ठान ((Rg. 10-87-25)) में Agni Rakshoha की कृपा तथा चित्त-शुद्धि हेतु प्रयुक्त।

Mantra 96

Devata: Devah · Rishi: Devah Devatah, Praskanva Kanva

त्वम॑ग्ने॒ वसूँ॑रि॒ह रु॒द्राँ आ॑दि॒त्याँ उ॒त | यजा॑ स्वध्व॒रं जनं॒ मनु॑जातं घृत॒प्रुष॑म् ||

Tvam agne vasum riha rudram ddityam uta.

Mantra 97

Devata: Agni · Rishi: Dirghatama Auchathya

पु॒रु त्वा॑ दा॒श्वान् वो॑चे॒ ऽरिर॑ग्ने॒ तव॑ स्वि॒दा | तो॒दस्ये॑व शर॒ण आ म॒हस्य॑ ||

Mantra 98

Devata: Agni · Rishi: Vishvamitra Gathina

प्र होत्रे॑ पू॒र्व्यं वचो॒ऽग्नये॑ भरता बृ॒हत् | वि॒पां ज्योतीं॑षि॒ बिभ्र॑ते॒ न वे॒धसे॑ ||

Mantra 99

Devata: Agni · Rishi: Gotama Rahugana

अग्ने॒ वाज॑स्य॒ गोम॑त॒ ईशा॑नः सहसो यहो | अ॒स्मे धे॑हि जातवेदो॒ महि॒ श्रव॑: ||

Agne vajasya gomata tsanah sahaso yaho.

Mantra 100

Devata: Agni · Rishi: Vishvamitra Gathina

अग्ने॒ यजि॑ष्ठो अध्व॒रे दे॒वान् दे॑वय॒ते य॑ज | होता॑ म॒न्द्रो वि रा॑ज॒स्यति॒ स्रिध॑: ||

Agne yajistho adhvare devan devayate yaja. Hota mandro vi rajasyati sridhah.

Mantra 101

Devata: Pavamana Soma · Rishi: Trita Aptya

ज॒ज्ञा॒नं स॒प्त मा॒तरो॑ वे॒धाम॑शासत श्रि॒ये | अ॒यं ध्रु॒वो र॑यी॒णां चिके॑त॒ यत् ||

Mantra 102

Devata: Aditi · Rishi: Irimbithi Kanva

उ॒त स्या नो॒ दिवा॑ म॒तिरदि॑तिरू॒त्या ग॑मत् | सा शंता॑ति॒ मय॑स्कर॒दप॒ स्रिध॑: ||

Mantra 103

Devata: Agni · Rishi: Vishvamana Vaiyashva

ईळि॑ष्वा॒ हि प्र॑ती॒व्यं१ यज॑स्व जा॒तवे॑दसम् | च॒रि॒ष्णुधू॑म॒मगृ॑भीतशोचिषम् ||

Mantra 104

Devata: Agni · Rishi: Vishvamana Vaiyashva

न तस्य॑ मा॒यया॑ च॒न रि॒पुरी॑शीत॒ मर्त्य॑: | यो अ॒ग्नये॑ द॒दाश॑ ह॒व्यदा॑तिभिः ||

Mantra 105

Devata: Agni · Rishi: Rjishva Bharadvaja

अप॒ त्यं वृ॑जि॒नं रि॒पुं स्ते॒नम॑ग्ने दुरा॒ध्य॑म् | द॒वि॒ष्ठम॑स्य सत्पते कृ॒धी सु॒गम् ||

Mantra 106

Devata: Agni · Rishi: Vishvamana Vaiyashva

श्रु॒ष्ट्य॑ग्ने॒ नव॑स्य मे॒ स्तोम॑स्य वीर विश्पते | नि मा॒यिन॒स्तपु॑षा र॒क्षसो॑ दह ||

Srustyagne navasya me stomasya vira vispate.

Mantra 107

Devata: Agni · Rishi: Prayoga Bhargavah

प्र मंहि॑ष्ठाय गायत ऋ॒ताव्ने॑ बृह॒ते शु॒क्रशो॑चिषे | उप॑स्तुतासो अ॒ग्नये॑ ||

Mantra 108

Devata: Agni · Rishi: Saubhari Kanva

प्र सो अ॑ग्ने॒ तवो॒तिभि॑: सु॒वीरा॑भिस्तिरते॒ वाज॑भर्मभिः | यस्य॒ त्वं स॒ख्यमा॒वर॑: ||

Pra so agne tavotibhih suvirabhis tarati

Mantra 109

Devata: Agni · Rishi: Saubhari Kanva

तं गू॑र्धया॒ स्व॑र्णरं दे॒वासो॑ दे॒वम॑र॒तिं द॑धन्विरे | दे॒व॒त्रा ह॒व्यमोहि॑रे ||

Mantra 110

Devata: Agni · Rishi: Prayoga Bhargava Saubahri Kanva

मा नो॑ हृणीता॒मति॑थि॒र्वसु॑र॒ग्निः पु॑रुप्रश॒स्त ए॒षः | यः सु॒होता॑ स्वध्व॒रः ||

Mantra 111

Devata: Agni · Rishi: Saubhari Kanva

भ॒द्रो नो॑ अ॒ग्निराहु॑तो भ॒द्रा रा॒तिः सु॑भग भ॒द्रो अ॑ध्व॒रः | भ॒द्रा उ॒त प्रश॑स्तयः ||

Mantra 112

Devata: Agni · Rishi: Saubhari Kanva

यजि॑ष्ठं त्वा ववृमहे दे॒वं दे॑व॒त्रा होता॑र॒मम॑र्त्यम् | अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतु॑म् ||

Yajistham tva vavrmahe devam devatra hota- ram amartyam. Asya yajnasya sukratum.

Mantra 113

Devata: Agni · Rishi: Saubhari Kanva

तद॑ग्ने द्यु॒म्नमा भ॑र॒ यत्सा॒सह॒त्सद॑ने॒ कं चि॑द॒त्रिण॑म् | म॒न्युं जन॑स्य दू॒ढ्य॑: ||

Tadagne dyumnama bhara yat sasaha sadane

Mantra 114

Devata: Agni · Rishi: Vishvamana Vaiyashva

यद्वा उ॑ वि॒श्पति॑: शि॒तः सुप्री॑तो॒ मनु॑षो वि॒शि | विश्वेद॒ग्निः प्रति॒ रक्षां॑सि सेधति ||