6.34.1
१-५ चातनः | अग्निः | गायत्री | प्राग्नये॒ वाच॑मीरय वृष॒भाय॑ क्षिती॒नाम् | स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑ ||
शत्रुनाशनम्।
6.34.1
१-५ चातनः | अग्निः | गायत्री | प्राग्नये॒ वाच॑मीरय वृष॒भाय॑ क्षिती॒नाम् | स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑ ||
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Source: DharmicData / AtharvaVeda (Sanskrit text)
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6.34.1
१-५ चातनः | अग्निः | गायत्री | प्राग्नये॒ वाच॑मीरय वृष॒भाय॑ क्षिती॒नाम् | स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑ ||
6.34.2
यो रक्षां॑सि नि॒जूर्व॑त्य॒ग्निस्ति॒ग्मेन॑ शो॒चिषा॑ | स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑ ||
6.34.3
यः पर॑स्याः परा॒वत॑स्ति॒रो धन्वा॑ति॒रोच॑ते | स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑ ||
6.34.4
यो विश्वा॒भि वि॒पश्य॑ति॒ भुव॑ना॒ सं च॒ पश्य॑ति | स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑ ||
6.34.5
यो अ॒स्य पा॒रे रज॑सः शु॒क्रो अ॒ग्निरजा॑यत | स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑ ||