19.24.1
१-८ अथर्वा | ब्रह्मणस्पतिः, बहुदैवत्यम् | अनुष्टुप्, ४-६, ८ त्रिष्टुप्, ७ त्रिपदाऽर्षी गायत्री | येन॑ दे॒वं स॑वि॒तारं॒ परि॑ दे॒वा अधा॑रयन् | तेने॒मं ब्र॑ह्मणस्पते॒ परि॑ रा॒ष्ट्राय॑ धत्तन ||
राष्ट्रम्।
19.24.1
१-८ अथर्वा | ब्रह्मणस्पतिः, बहुदैवत्यम् | अनुष्टुप्, ४-६, ८ त्रिष्टुप्, ७ त्रिपदाऽर्षी गायत्री | येन॑ दे॒वं स॑वि॒तारं॒ परि॑ दे॒वा अधा॑रयन् | तेने॒मं ब्र॑ह्मणस्पते॒ परि॑ रा॒ष्ट्राय॑ धत्तन ||
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Source: DharmicData / AtharvaVeda (Sanskrit text)
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19.24.1
१-८ अथर्वा | ब्रह्मणस्पतिः, बहुदैवत्यम् | अनुष्टुप्, ४-६, ८ त्रिष्टुप्, ७ त्रिपदाऽर्षी गायत्री | येन॑ दे॒वं स॑वि॒तारं॒ परि॑ दे॒वा अधा॑रयन् | तेने॒मं ब्र॑ह्मणस्पते॒ परि॑ रा॒ष्ट्राय॑ धत्तन ||
19.24.2
परी॒ममिन्द्र॒मायु॑षे म॒हे क्ष॒त्राय॑ धत्तन | यथै॑नं ज॒रसे॑ न॒यां ज्योक् क्ष॒त्रेऽधि॑ जागरत् ||
19.24.3
परी॒मं सोम॒मायु॑षे म॒हे श्रोत्रा॑य धत्तन | यथै॑नं ज॒रसे॒ नयां ज्योक् क्ष॒त्रेऽधि॑ जागरत् ||
19.24.4
परि॑ धत्त ध॒त्त नो॒ वर्च॑से॒मं ज॒रामृ॑त्युं कृणुत दी॒र्घमायुः॑ | बृह॒स्पतिः॒ प्राय॑च्छ॒द् वास॑ ए॒तत् सोमा॑य॒ राज्ञे॒ परि॑धात॒वा उ॑ ||
19.24.5
ज॒रां सु ग॑च्छ॒ परि॑ धत्स्व॒ वासो॒ भवा॑ गृष्टी॒नाम॑भिशस्ति॒पा उ॑ | श॒तं च॒ जीव॑ श॒रदः॑ पुरू॒ची रा॒यश्च॒ पोष॑मुप॒संव्य॑यस्व ||
19.24.6
परी॒दं वासो॑ अधिथाः स्व॒स्तयेऽभू॑र्वापी॒नाम॑भिशस्ति॒पा उ॑ | श॒तं च॒ जीव॑ श॒रदः॑ पुरू॒चीर्वसू॑नि॒ चारु॒र्वि भ॑जासि॒ जीव॑न् ||
19.24.7
योगे॑योगे त॒वस्त॑रं वाजे॑वाजे हवामहे | सखा॑य॒ इन्द्र॑मू॒तये॑ ||
19.24.8
हिर॑ण्यवर्णो अ॒जरः॑ सु॒वीरो॑ ज॒रामृ॑त्युः प्र॒जया॒ सं वि॑शस्व | तद॒ग्निरा॑ह॒ तदु॒ सोम॑ आह॒ बृह॒स्पतिः॑ सवि॒ता तदिन्द्रः॑ ||